कुछ नाटक के खत्म होने के बाद दर्शक अपनी सीट से उठकर बाहर निकल जाते हैं। लेकिन कुछ नाटक ऐसे होते हैं, जिनके खत्म होने के बाद भी कहानी दर्शकों के दिमाग में चलती रहती है। झारखंड के रांची स्थित सेंट्रल लाइब्रेरी के शहीद स्मृति सभागार में आयोजित ‘मेरा कुछ सामान’ मेरे लिए ऐसा ही एक नाटक रहा।
करीब एक घंटे पांच मिनट का यह नाटक पति-पत्नी के रिश्ते, उनके बीच पैदा होती दूरियों, छोटी-छोटी शिकायतों के बड़े होते जाने और अंततः तलाक तक पहुंच चुके रिश्ते को एक अलग नजरिये से देखने की कोशिश करता है। नाटक की खूबसूरती यह है कि यह रिश्तों को केवल सही और गलत के खांचे में रखकर नहीं देखता, बल्कि उस धुंधले इलाके में ले जाता है जहां दोनों सही भी हो सकते हैं और दोनों कहीं न कहीं गलत भी।
नाटक के लेखक रविकांत मिश्रा स्वयं दर्शकों के बीच मौजूद थे। झारखंड के रंगमंच के चर्चित हस्ताक्षर अजय मलकानी के मार्गदर्शन में पंकज कुमार ने इसका निर्देशन किया। नाटक के मुख्य पात्र तरुण और स्मृति के रूप में अभिनेता और युवा रंगमंच, रांची के सचिव शंकर पाठक और ज्योति गुप्ता ने शानदार अभिनय किया और मंच पर पति-पत्नी के उस तनाव को जीवंत किया, जिसे शायद आज के कई दंपती अपने-अपने घरों में किसी न किसी रूप में महसूस करते हैं।
तलाक के बाद फिर साथ रहने की कहानी
नाटक की कहानी दिलचस्प मोड़ से शुरू होती है। पति-पत्नी तलाक के लिए अदालत पहुंच चुके हैं। दोनों के बीच इतना कुछ टूट चुका है कि साथ रहने की संभावना लगभग खत्म लगती है। लेकिन अदालत उन्हें तुरंत अलग होने की अनुमति देने के बजाय एक महीने के लिए अपने पुराने घर में साथ रहने का आदेश देती है। यहीं से नाटक असल मायने में शुरू होता है।
एक ऐसा पति जो पेशे से इंजीनियर है लेकिन सिगरेट और शराब भी पीता है और एक ऐसी पत्नी जिसे सिगरेट से परहेज है, लेकिन अब वह भी शराब पीने लगी है। इसके अलावे भी दोनों एक दूसरे की कई आदतों से परेशान हैं, लेकिन दोनों को फिर उसी घर में एक महीने साथ रहना है, जहां कभी साथ जिंदगी शुरू करने के सपने देखे गए थे।
दिलचस्प बात यह है कि नाटक सिगरेट और शराब को पति के पूरे चरित्र का पर्याय नहीं बनाता। यही बात मुझे व्यक्तिगत रूप से महत्वपूर्ण लगी। वैसे भी शराब और सिगरेट किसी व्यक्ति की बुरी आदत हो सकती है, लेकिन जरूरी नहीं कि यह आदत उसके व्यक्तित्व या उसके चरित्र को भी बुरा परिभाषित करे।
रिश्तों में भी अक्सर समस्या यही होती है। हम सामने वाले की एक आदत, एक गलती या एक कमी को पकड़ लेते हैं और धीरे-धीरे उसी के आधार पर उसके पूरे व्यक्तित्व का फैसला करने लगते हैं। बहसें शुरू हो जाती है और रिश्तों में कड़वाहट की मोम जमने लगती है। लेकिन यह नाटक इस संदेश पर भी खत्म होती है कि पति-पत्नी के रिश्तों में जमीं कड़वाहट की मोम को साथ रहकर ही पिघलाया भी जा सकता है।

‘समझाने’ से ज्यादा जरूरी है ‘समझना’
‘मेरा कुछ सामान’ का सबसे मजबूत पक्ष शायद यही है कि यह रिश्ते में संवाद से आगे बढ़कर समझ की बात की बात करता है। पति-पत्नी अक्सर एक-दूसरे को बदलने की कोशिश करते हैं। कोई कहता है। अक्सर इस बात पर बहस हो जाती हे कि ‘तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए’ या ‘तुम न मेरी बात समझती हो और न मुझे।’ लेकिन शायद रिश्ते में एक और सवाल पूछा जाना चाहिए, ‘तुम ऐसा क्यों करते हो?’ क्योंकि पति-पत्नी के रिश्तों में किसी को समझाने से पहले उसे समझने की कोशिश करना ज्यादा बेहतर होता है। यही फर्क कई बार रिश्ते को बचा सकता है। यह नाटक दर्शकों के सामने एक सवाल रखता है कि क्या हर रिश्ते को सिर्फ उसकी कमियों से परखा जाना चाहिए, या उसकी संभावनाओं को भी एक मौका मिलना चाहिए? क्या रिश्ते सिर्फ वजह की बुनियाद पर होने चाहिए, बेवजह नहीं? रिश्तों में प्रेम की शुरुआत शायद किसी वजह से हो सकती है, लेकिन उसे टिकाए रखने के लिए हर चीज की वजह तलाशना जरूरी नहीं होता।
लाइटर, सिगरेट और रिश्ते की रोशनी
नाटक का एक संवाद विशेष रूप से ध्यान खींचता है। जब स्मृति, तरुण से कहती है, ‘लाइटर से सिर्फ सिगरेट ही नहीं, मोमबत्ती भी जलाई जा सकती है और घर को रोशन भी किया जा सकता है।’ एक साधारण-सी वस्तु के जरिए कही गई यह बात रिश्तों पर भी लागू होती है। हम अक्सर किसी व्यक्ति को उसकी बुरी आदत से पहचान लेते हैं, जबकि उसी व्यक्ति के भीतर मौजूद अच्छाइयों को देखने की कोशिश नहीं करते। लाइटर वही है। इस्तेमाल बदल गया तो उसका अर्थ बदल गया। शायद रिश्तों में भी ऐसा ही होता है। इंसान को उसकी एक आदत से नहीं, उसके पूरे व्यवहार से समझना चाहिए।
रिश्ता एक संभावना है
इसी नाटक का एक और बेहतरीन संवाद है। इस संवाद की एक पंक्ति भीतर तक उतरती है। नायक कहता है, ‘रिश्ता एक संभावना है और तलाक उस रिश्ते की संभावनाओं की मौत।’ हालांकि हर तलाक को असफलता कहना उचित नहीं होगा। कुछ रिश्तों से बाहर निकलना ही बेहतर रास्ता हो सकता है। लेकिन इस नाटक का संदर्भ अलग है। यहां सवाल उस रिश्ते का है, जिसमें संवाद की गुंजाइश अभी बाकी है, जहां भावनाएं पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं और जहां साथ रहने की संभावना अभी जीवित है। ऐसे में शायद तलाक के मोड़ पर खड़े पति-पत्नी अंतिम निर्णय लेने से पहले एक सवाल जरूर पूछता हैं कि क्या हमने रिश्ता खत्म करने की पूरी कोशिश की है, या उसे बचाने की?

एक महीने का साथ और बदलता हुआ रिश्ता
नाटक का सबसे मजबूत आधार और दिलचस्प हिस्सा वह एक महीना है। जिस पति-पत्नी ने अदालत में अपने रिश्ते को खत्म करने का फैसला किया था, वही दो लोग जब मजबूरी में फिर एक छत के नीचे रहते हैं तो धीरे-धीरे उनके बीच जमी बर्फ पिघलने लगती है। पुरानी यादें लौटती हैं। बातचीत शुरू होती है। छोटी-छोटी चीजें फिर से दिखाई देने लगती हैं। शिकायतों के बीच कहीं दबा हुआ अपनापन सामने आता है। और दर्शक महसूस करता है कि शायद रिश्ता खत्म नहीं हुआ था। बस दोनों ने एक-दूसरे को सुनना बंद कर दिया था।
नाटक का अंत इसी उम्मीद के साथ होता है। पति-पत्नी दोनों तलाक न लेने का फैसला करते हैं और और दोनों एक-दूसरे को गले लगा लेते हैं। यह गले मिलना सिर्फ दो किरदारों का मिलना नहीं है। यह उस संवाद की वापसी है, जो उनके बीच कहीं खो गया था।
गंभीर विषय के बीच हंसी की जगह
नाटक की एक खासियत यह भी रही कि इतने गंभीर विषय के बावजूद प्रस्तुति लगातार भारी-भरकम नहीं बनी रहती। बीच-बीच में आए कॉमेडी सीन्स ने दर्शकों को हंसाया भ्ज्ञी। यह हास्य कहानी से अलग नहीं लगता, बल्कि रिश्तों की रोजमर्रा की वास्तविकता का हिस्सा बनकर आता है। आखिर पति-पत्नी के रिश्ते सिर्फ गंभीर बातचीत, झगड़े और आंसुओं से नहीं बनते। उसमें नोंकझोंक भी होती है, मजाक भी, गुस्सा भी और वही छोटी-छोटी बातें भी, जिन्हें बाद में याद करके मुस्कुराया जाता है। इन्हीं वजहों से नाटक दर्शक से दूरी नहीं बनाता। वह उपदेश देने के बजाय उसे कहानी के भीतर ले जाता है।
शानदार अभिनय और प्रस्तुति का उदाहरण
तरुण और स्मृति के किरदार में शंकर पाठक और ज्योति गुप्ता ने शानदार तरीके से एक ऐसे पति को सामने रखा, जिसमें कमियां हैं, शिकायतें हैं, नाराजगी है, बुरी आदतें हैं, लेकिन भावनाएं भी हैं। दोनों में आत्मसम्मान और भीतर बचा हुआ लगाव, इन भावों का संतुलन देखने को मिलता है।
निर्देशक पंकज कुमार के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही रही होगी कि पति-पत्नी के रिश्ते की भावनात्मक यात्रा को करीब एक घंटे में विश्वसनीय बनाया जाए। प्रस्तुति के दौरान यह यात्रा कई जगह सहज दिखाई देती है।
नाटक के आरंभ होने से पहले मंच का संचालन अजय मलकानी ने स्वयं किया। उनके अनुभव और रंगमंच से लंबे जुड़ाव की छाप कार्यक्रम की प्रस्तुति में दिखाई देती है। झारखंड में रंगमंच की जरूरतों और अभावों पर भी उन्होंने अपने बात रखी। अन्य राज्यों की तुलना में झारखंड में रंगमंच के कार्यक्रमों की चुनौतियों का भी जिक्र उन्होंने किया।
नाटक के मुख्य प्रायोजक अदाणी पावर की ओर से कंपनी के हेड, कॉरपोरेट सर्विसेज सजीव शेखर भी अतिथि के रूप में मौजूद रहे। किसी कॉरपोरेट संस्था द्वारा ऐसे रंगमंचीय प्रयास को समर्थन मिलना इस दृष्टि से भी उल्लेखनीय है कि रंगमंच केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज के महत्वपूर्ण सवालों पर संवाद का माध्यम भी है।

अंत में दर्शकों के लिए कुछ सवाल
‘मेरा कुछ सामान’ देखने के बाद सबसे बड़ा सवाल शायद यह नहीं रह जाता कि तरुण और स्मृति का तलाक क्यों होने वाला था? सवाल यह बन जाता है कि हम अपने रिश्तों में एक-दूसरे को कितना समझते हैं? हम कितनी जल्दी फैसला सुना देते हैं? कितनी जल्दी कह देते हैं कि तुम ऐसे ही हो। और कितनी कम बार पूछते हैं कि तुम ऐसी क्यों हो?
शायद हर रिश्ते में कुछ ऐसा सामान होता है, जिसे हम छोड़ नहीं पाते। कुछ यादें, कुछ शिकायतें, कुछ गलतफहमियां, कुछ अधूरे संवाद और कुछ उम्मीदें। इसीलिए इस नाटक का शीर्षक ‘मेरा कुछ सामान’ केवल एक नाम नहीं लगता। यह उन भावनाओं का रूपक बन जाता है, जिन्हें इंसान रिश्ता खत्म होने के बाद भी अपने भीतर लेकर चलता है।
शायद रिश्ते को बचाने के लिए कभी-कभी उस ‘सामान’ को फेंकना नहीं, खोलकर देखना पड़ता है। हो सकता है उसमें शिकायतों के नीचे प्रेम बचा हो। गलतफहमियों के नीचे अपनापन बचा हो। तलाक के कागजों के बीच कहीं एक रिश्ता अब भी सांस ले रहा हो। ‘मेरा कुछ सामान’ इसी संभावना को मंच पर एक घंटे से कुछ अधिक समय में सामने रखता है। और खत्म होते ही दर्शकों के मन में एक सवाल छोड़ जाता है। रिश्ते टूटने की वजह तलाशना आसान है, लेकिन क्या हमने कभी उन्हें बचने की वजह तलाशने की कोशिश की है?