भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के प्याज एवं लहसुन अनुसंधान निदेशालय (ICAR-DOGR), राजगुरुनगर (पुणे) के वैज्ञानिकों ने अखिल भारतीय नेटवर्क अनुसंधान परियोजना के तहत प्याज की 8 ऐसी उन्नत किस्मों (जीनोटाइप) की पहचान की है, जो उच्च पैदावार देने के साथ-साथ भारत की विविध जलवायु परिस्थितियों में भी स्थिर प्रदर्शन करती हैं। यह शोध ‘इंडियन जर्नल ऑफ जेनेटिक्स एंड प्लांट ब्रीडिंग’ में प्रकाशित हुआ है।
ये हैं आठ उन्नत किस्में
रबी सीजन के दौरान देश के 5 अलग-अलग कृषि-जलवायु क्षेत्रों में किए गए व्यापक परीक्षणों के आधार पर इन किस्मों का चयन किया गया है।
लाल प्याज की 5 किस्में: RO-1769, RO-1773, RO-1783, भीमा किरण (Bhima Kiran), और NHRDF रेड-2 (NHRDF Red-2)।
सफेद प्याज की 3 किस्में: W-444, W-500, और W-045 ।

उत्पादन स्थिरता का महत्व
पारंपरिक रूप से प्याज की किस्मों को केवल अधिक उपज के आधार पर आंका जाता था, लेकिन अलग-अलग क्षेत्रों में उनके उत्पादन की मात्रा बदल जाती थी। । वैज्ञानिकों के अनुसार, इन 8 किस्मों में पर्यावरण और जीनोटाइप का नकारात्मक प्रभाव न्यूनतम पाया गया है। इसका अर्थ यह है कि अनुसंधान केंद्र से निकलकर जब ये बीज देश के किसी भी राज्य में किसानों के खेतों तक पहुंचेंगे, तब भी इनकी पैदावार में गिरावट नहीं आएगी।
भारतीय कृषि और बाजार के लिए क्यों है यह खास?
भारत दुनिया का सबसे बड़ा प्याज उत्पादक है, जहां महाराष्ट्र (नासिक), कर्नाटक, मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान जैसे राज्यों में मिट्टी, बारिश और तापमान काफी अलग-अलग है। लेकिन इसके बावजूद प्याज की यह किस्में इन सभी परिस्थितियों में समान रूप से अच्छी पैदावार देती है। अक्सर किसी एक क्षेत्र में मौसम खराब होने से उत्पादन गिर जाता है, जिससे देश भर में प्याज के दाम आसमान छूने लगते हैं और निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ता है । लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर स्थिर उत्पादन देने वाली ये किस्में बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव को रोकने में मदद करेंगी। व्यावसायिक रिलीज प्रक्रिया पूरी होने के बाद इन किस्मों के बीजों को सरकारी एजेंसियों, सहकारिताओं और बीज कंपनियों के माध्यम से किसानों तक पहुंचाया जाएगा।
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