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Panchayat Darpan

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कहानी रामगढ़ के कविता की : न जूते थे, न ट्रैक सूट… साड़ी में नंगे पांव दौड़ी कविता, बोलीं- बच्चों की जिंदगी बदलनी है

झारखंड के रामगढ़ जिले के सोसो गांव की सुबह अभी ठीक से जागती भी नहीं है। ज्यादातर घरों में चूल्हा जलने का वक्त भी नहीं हुआ होता। इसी समय कविता देवी उठ जाती हैं। घर का काम शुरू करने से पहले वह गांव के पास मैदान की ओर निकलती हैं। कुछ देर दौड़ती हैं। फिर वापस आकर बच्चों और घर की जिम्मेदारियां संभालती हैं। इसके बाद मजदूरी के लिए निकल जाती हैं।

कविता कहती हैं, “मेरी जिंदगी तो खराब हो ही चुकी है। लेकिन मैं अपने बच्चों की जिंदगी खराब नहीं करना चाहती।” करीब तीन साल पहले बीमारी से पति की मौत के बाद कविता के सामने दो बच्चों की परवरिश की जिम्मेदारी आ गई। बेटा सातवीं और बेटी आठवीं कक्षा में पढ़ती है। ससुर भी उनके साथ रहते हैं। घर चलाने के लिए कभी ईंट भट्ठे में मजदूरी करती हैं, तो कभी दूसरे घरों में काम करती हैं। इसी संघर्ष के बीच उन्होंने होमगार्ड बनने का सपना देखा है।

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मैदान में सबके पास जूते थे, कविता के पास सिर्फ हौसला

कविता बताती हैं कि स्कूल के समय से ही खेलकूद में उनकी रुचि थी। दौड़ना उन्हें सबसे ज्यादा पसंद था। रामगढ़ में होमगार्ड भर्ती की दौड़ की जानकारी मिली तो पुराना शौक फिर जाग गया। उन्होंने तय किया कि गरीबी रास्ता नहीं रोकेगी। ट्रायल के दिन जिला मैदान पहुंचीं। वहां दूसरे अभ्यर्थियों को जूते और ट्रैक सूट में देखकर उन्हें अपनी कमी का अहसास हुआ।

कविता कहती हैं, “मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं कि अच्छे जूते और ट्रैक सूट खरीद सकूं। लेकिन मैंने सोचा कि दौड़ना है तो दौड़ना है।” फिर साड़ी को संभाला और नंगे पांव मैदान में उतर गईं। 1600 मीटर की दौड़ करीब 6 मिनट 45 सेकेंड में पूरी की। वह छठे स्थान पर रहीं। दौड़ खत्म हुई तो शरीर थका था। सांसें तेज थीं। लेकिन चेहरे पर अपने प्रदर्शन का संतोष था।

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खेत-खलिहान और मजदूरी के बीच तैयार हो रही खाकी की उम्मीद

कविता के लिए अभ्यास के लिए अलग से समय निकालना आसान नहीं है। सुबह बच्चों के साथ गांव के पास मैदान में दौड़ती हैं। फिर घर का काम करती हैं। इसके बाद मजदूरी के लिए निकल जाती हैं। गांव से जहां ट्रेनिंग होती है, वह जगह दूर है। आने-जाने का खर्च भी है। इसलिए नियमित ट्रेनिंग नहीं हो पाती।

मौका मिलने पर ट्रेनिंग के लिए जाती हैं। बाकी दिनों में गांव का मैदान ही उनका अभ्यास केंद्र है। गांव की पगडंडी, कच्चे रास्ते और साधारण मैदान पर दौड़ते हुए वह खुद को भर्ती के लिए तैयार कर रही हैं। कविता के पास आधुनिक ट्रेनिंग किट नहीं है। लेकिन लक्ष्य साफ है। उन्हें खाकी वर्दी पहननी है।

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‘नौकरी मिली तो सबसे पहले बच्चों के लिए करूंगी’

रामगढ़ में 24 अक्टूबर से 5 नवंबर तक होमगार्ड बहाली की प्रक्रिया प्रस्तावित है। कुल 284 पदों पर बहाली होनी है। महिलाओं के लिए 50 प्रतिशत सीटों का प्रावधान है। विधवा और तलाकशुदा महिलाओं के लिए 5 प्रतिशत अतिरिक्त आरक्षण का प्रावधान भी बताया गया है। इसी भर्ती के ट्रायल में कई महिलाएं साड़ी पहनकर दौड़ती नजर आईं। लेकिन कविता का नंगे पांव दौड़ना चर्चा में आ गया। उनका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।

कविता कहती हैं, “बच्चों को वह सब नहीं दे पा रही हूं, जो देना चाहती हूं। अगर नौकरी मिल गई तो सबसे पहले घर की आर्थिक स्थिति सुधारूंगी। बच्चों की पढ़ाई अच्छे से कराऊंगी।” उनकी कहानी सिर्फ एक दौड़ की कहानी नहीं है। यह उस ग्रामीण महिला की कहानी है, जो मजदूरी और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच अपने बच्चों के लिए बेहतर कल की तलाश में रोज दौड़ रही है। मैदान में उनके पांव नंगे थे, लेकिन हौसला मजबूत था।