भारतीय कृषि में महिलाओं का योगदान अतुल्य है. महिलाएं भारतीय कृषि की रीढ़ हैं जो बिना थके, बिना रूके और बिना शिकायत और अधिकार मांगे सिर्फ काम करती है. इसके बावजूद मौजूदा कृषि प्रणाली और संसाधन आज भी उनके खिलाफ हैं. कृषि क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी और उनके साथ हो रहे व्यवस्थागत भेदभाव को लेकर हाल ही में एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट सामने आई है. “हर हार्वेस्ट: द हिडन कॉस्ट ऑफ वीमेन्स इनविजिबल वर्क इन Indian Agriculture” (Her Harvest: The hidden cost of women’s invisible work in Indian agriculture) नाम से जारी किए गए रिपोर्ट में कई चौंकानेवाले तथ्य सामने आए हैं. हाल ही में आर्या.एजी इंडस्ट्री इनसाइट्स (Arya.ag Industry Insights) ने यह रिपोर्ट जारी की है. यह रिपोर्ट दिखाती है कि भारतीय कृषि क्षेत्र में महिलाएं तो अपना भरपूर योगदान दे रही है लेकिन इसके बदले में उन्हें उचित अधिकार और पहचान नहीं मिल पा रहा है.
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भागीदारी बढ़ी पर मालिकाना हक नहीं
इस रिपोर्ट के अनुसार कृषि क्षेत्र में ग्रामीण कामकाजी महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है. रिपोर्ट में पेश किए गए आंकड़ों के अनुसार भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाली लगभग 76.95% (करीब 77%) महिलाएं कृषि क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं. लेकिन खेतों में काम करने वाली सिर्फ 11.72% महिलाओं के पास ही उस जमीन का मालिकाना हक है. कृषि कार्यबल (agricultural workforce) में महिलाओं की हिस्सेदारी वर्ष 2017-18 के 57% से बढ़कर वर्ष 2023-24 में 64% से अधिक हो चुकी है. रिपोर्ट के अनुसार घर के पुरुष तो शहरों में काम करने के लिए पलायन कर जाते हैं जो बाहर जाकर गैर कृषि कार्य करते हैं लेकिन उनके पीछे महिलाएं की प्रमुख रूप से खेतों का प्रबंधन संभाल रही है. हालांकि खेतों में हाड़तोड़ मेहनत करने के बाद भी उन्हें उनकी मेहनत का फल नहीं मिलता है.जमीन पर उनके अधिकार न के बराबर हैं. देश के कुल कृषि योग्य भूमि क्षेत्र (farmed area) में से मात्र 11.72% हिस्से पर ही महिलाओं का नियंत्रण या मालिकाना हक है. यह स्थिति महिलाओं द्वारा किए जा रहे असल मेहनत और और जमीन पर उनके नियंत्रण के बीच पांच गुणा से अधिक का अंतर पैदा करती है. भूमि का स्वामित्व न होने के कारण महिलाओं को बैंक लोन (credit), आधुनिक उपकरण और सरकारी योजनाओं का लाभ मिलने में भारी कठिनाई होती है.
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महिलाओं को मिलती है कम मजदूरी
रिपोर्ट के अनुसार महिलाएं खेतों में पुरुषों के बराबर काम करती है लेकिन इसके बावजूद उन्हें पुरुषों की तुलना में कम मजदूरी मिलती है. खेत पर काम करने वाली एक महिला को प्रतिदन औसतन 82 रुपये ही मिलते हैं जबकि पुरुषों को उसी काम के बदले प्रतिदिन 100 रुपये मिलते हैं. इसके अलावा, कृषि क्षेत्र में काम करने वाली लगभग 47.7% महिलाएं पारिवारिक खेतों पर “बिना वेतन पाने वाले मददगार” (unpaid helpers) के रूप में काम करती हैं, जबकि पुरुषों के मामले में यह आंकड़ा सिर्फ 20.2% है. महिलाओं पुरुषों के बराबर ही काम करती है लेकिन उनके नाम पर जमीन नहीं होने के कारण उन्हें लोन नहीं मिल पाता है, खाद-बीज जैसे कृषि इनपुट की कमी और सरकारी सहायता भी नहीं मिल पाती है. इसके कारण जिन खेतों को महिलाएं संचालित करती हैं उन खेतों में पुरुषों की तुलना में 24 प्रतिशत कम उत्पादन होता है.
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देश की अर्थव्यवस्था पर भारी असर
महिलाओं को समान अधिकार और संसाधन न मिलने का खामियाजा पूरे देश को भुगतना पड़ रहा है. संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (FAO) के अनुमानों के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट में बताया गया है कि संसाधनों के असमान वितरण के कारण देश की 48.7 लाख करोड़ रुपये की कृषि अर्थव्यवस्था को हर साल 1.2 लाख करोड़ रुपये से लेकर 2 लाख करोड़ रुपये तक का भारी नुकसान हो रहा है. इसलिए यदि महिला किसानों को समान संसाधन उपलब्ध कराए जाएं, तो उनके खेतों की उत्पादकता में 20% से 30% की बढ़ोतरी हो सकती है. इससे न केवल देश का कुल कृषि उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि परिवारों की आय भी 20-30% तक बढ़ जाएगी. रिपोर्ट के अनुसार, महिलाएं अपनी बढ़ी हुई आय का 90% हिस्सा परिवार के पोषण, बच्चों की शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करती हैं.
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सुधार के लिए सुझाव
रिपोर्ट के अनुसार इन परिस्थितियों में सुधार करने के लिए कुछ सुझाव दिए गए हैं. जिनमें कहा गया है कि महिलाओं को औपचारिक रुप से किसान की मान्य़ता दी जानी चाहिए. इसके लिए मालिकाना हक जरूरी नहीं है. बिना किसी गारंटी (collateral-light) के ऋण और महिलाओं के नाम पर किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) जारी किए जाएं, ताकि लोन का आधार जमीन के बजाय उनकी फसल बन सके. ड्रोन (जैसे नमो ड्रोन दीदी योजना), सरकारी सलाह और आधुनिक तकनीकों को महिलाओं द्वारा संचालित संस्थानों तक पहुंचाया जाए. महिला-नेतृत्व वाले किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को स्थायी बाजार संस्थानों के रूप में विकसित किया जाए. बता दें कि संयुक्त राष्ट्र ने साल 2026 को ‘महिला किसान का अंतर्राष्ट्रीय वर्ष’ (International Year of the Woman Farmer) घोषित किया है.
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