केंद्र सरकार ने जैविक और प्राकृतिक खेती के क्लस्टरों को सशक्त बनाने के लिए नई मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) जारी की है। इसका सीधा लाभ झारखंड के किसानों, एफपीओ और स्वयं सहायता समूहों को मिलने की उम्मीद है। केंद्र ने एसओपी की जानकारी झारखंड समेत सभी राज्यों को दी है। नई व्यवस्था में बेहतर प्रदर्शन करने वाले किसान समूहों और क्लस्टरों की पहचान कर उन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजार के लिए तैयार करने पर जोर दिया गया है। खासकर पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों में उत्पादित जैविक और प्राकृतिक उत्पादों को प्राथमिकता देने की रणनीति बनायी गयी है। इससे झारखंड के सुदूर ग्रामीण और जनजातीय इलाकों में पारंपरिक तरीके से खेती करने वाले किसानों को निर्यात बाजार से जुड़ने का अवसर मिल सकता है।
एनपीओपी प्रमाणन की प्रक्रिया होगी आसान, निर्यात में मिलेगी मदद
नई एसओपी के तहत नेशनल प्रोग्राम फॉर ऑर्गेनिक प्रोडक्शन (एनपीओपी) के प्रमाणन की प्रक्रिया को सरल बनाने पर जोर दिया गया है। अभी झारखंड के कई किसान केवल पीजीएस स्तर पर प्रमाणित हैं, जिसके कारण उनके उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में भेजने में दिक्कत होती है। नई व्यवस्था में चयनित किसानों और क्लस्टरों को वित्तीय सहायता देकर एनपीओपी यानी थर्ड पार्टी सर्टिफिकेशन दिलाने की व्यवस्था की जायेगी। इससे उनके उत्पादों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में स्वीकार्यता मिलने की राह आसान होगी। खासकर टमाटर, मटर, अन्य सब्जियों और मोटे अनाज जैसे उत्पादों के लिए यह व्यवस्था महत्वपूर्ण हो सकती है। प्रमाणन के साथ उत्पादों की गुणवत्ता, पैकेजिंग और बाजार की जरूरतों के अनुरूप तैयारी पर भी ध्यान दिया जायेगा। इससे किसानों को स्थानीय बाजार तक सीमित रहने के बजाय बड़े घरेलू और विदेशी खरीदारों तक पहुंच बनाने का अवसर मिलेगा।

नेशनल ब्रांड से जुड़ेंगे उत्पाद, बिचौलियों पर निर्भरता घटेगी
केंद्र की योजना के तहत झारखंड के किसानों के उत्पादों को नेशनल को-ऑपरेटिव ऑर्गेनिक्स लिमिटेड (एनसीओएल) के ‘नेशनल ब्रांड’ से जोड़ने की दिशा में काम किया जायेगा। इससे किसानों के उत्पादों को बड़ी कंपनियों, ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म और घरेलू रिटेल चेन तक पहुंच मिल सकती है। साथ ही राज्य के विशिष्ट और जीआई टैग वाले उत्पादों की पहचान कर उन्हें राष्ट्रीय और वैश्विक बाजार में प्रमोट करने की संभावना भी बनेगी। झारखंड के जंगलों और ग्रामीण क्षेत्रों में मिलने वाले करंज, हनी, महुआ सहित कई प्राकृतिक उत्पादों को भी इससे बाजार मिल सकता है। इसका लाभ केवल खेती करने वाले किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जंगलों से प्राकृतिक उत्पादों का संग्रह करने वाले ग्रामीण और संग्राहक समुदायों को भी मिलने की उम्मीद है। बाजार से सीधा जुड़ाव होने पर बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और उत्पादों का बेहतर मूल्य दिलाने में मदद मिल सकती है।
कोल्ड स्टोरेज से पैकेजिंग तक सुविधाएं, खराब होने वाले उत्पादों को मिलेगा बाजार
नई व्यवस्था में चयनित क्लस्टरों को उत्पादन के साथ-साथ प्रसंस्करण और भंडारण की सुविधाओं से जोड़ने की योजना है। पीकेवीवाई और आरकेवीवाई जैसी योजनाओं के माध्यम से कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग यूनिट, ग्रेडिंग, सुखाने और पैकेजिंग जैसी बुनियादी सुविधाएं विकसित की जायेंगी। झारखंड में सब्जियों और अन्य कृषि उत्पादों की बड़ी मात्रा में पैदावार होती है, लेकिन पर्याप्त भंडारण और प्रसंस्करण की सुविधा नहीं होने से किसानों को नुकसान उठाना पड़ता है। नई व्यवस्था में यदि इन सुविधाओं का विस्तार होता है तो उत्पादों की बर्बादी कम होगी और किसानों को उन्हें लंबे समय तक सुरक्षित रखने का विकल्प मिलेगा। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बाजार की मांग के अनुरूप गुणवत्ता और पैकेजिंग तैयार होने से निर्यात की संभावनाएं बढ़ेंगी। पहाड़ी और जनजातीय क्षेत्रों को प्राथमिकता मिलने के कारण झारखंड के ग्रामीण इलाकों के किसानों और प्राकृतिक उत्पाद संग्राहकों को इस नीति का विशेष लाभ मिलने की संभावना है।