मुश्किल हालात इंसान के सामने अक्सर दो रास्ते रखते हैं – या तो वह परिस्थितियों के आगे हार मान ले या फिर उन्हीं परिस्थितियों को अपनी ताकत बना ले। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले की राजकुमारी देवी ने दूसरा रास्ता चुना। सरैया प्रखंड के आनंदपुर गांव में आर्थिक तंगी के बीच पली-बढ़ीं राजकुमारी देवी की शादी महज 15 वर्ष की उम्र में एक किसान परिवार में हो गई थी। शादी के बाद उन्होंने देखा कि परिवार की आय मुख्य रूप से तंबाकू की खेती पर निर्भर थी, लेकिन इससे घर का खर्च चलाना आसान नहीं था। संतान न होने को लेकर उन्हें सामाजिक तानों और अपमान का भी सामना करना पड़ा। कई मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, परिस्थितियां इतनी कठिन हुईं कि एक समय उन्हें घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। ऐसे दौर में भी उन्होंने खुद को टूटने नहीं दिया। उन्होंने खेतों में काम करना शुरू किया और अपनी जिंदगी को अपने दम पर नई दिशा देने की ठानी। यही वह दौर था, जब उनके भीतर आत्मनिर्भर बनने की इच्छा ने आकार लेना शुरू किया।
बाजार दूर था, तो साइकिल को बनाया अपना सहारा
खेती से सब्जियां और फल तो मिलने लगे, लेकिन उन्हें बेचने के लिए बाजार तक पहुंचना बड़ी चुनौती थी। गांव में तैयार उत्पादों को खरीदने वाले ग्राहक भी कम थे। राजकुमारी देवी ने समस्या को बाधा मानने के बजाय उसका रास्ता तलाशा। उन्होंने साइकिल चलाना सीखा और उस पर अचार, मुरब्बा समेत घर में तैयार किए गए खाद्य उत्पाद लादकर गांव-गांव, हाट-बाजार और मेलों में जाना शुरू कर दिया। उस समय ग्रामीण समाज में किसी महिला का अकेले साइकिल चलाकर बाजार जाना सामान्य बात नहीं थी। उन्हें लोगों की बातें और मजाक भी सुनना पड़ा, लेकिन उन्होंने अपने कदम नहीं रोके। साइकिल उनके लिए केवल आवागमन का साधन नहीं रही, बल्कि आत्मनिर्भरता की पहली सीढ़ी बन गई। धीरे-धीरे उनके उत्पाद लोगों तक पहुंचने लगे और मेहनत का असर आमदनी में दिखाई देने लगा। उन्होंने समझ लिया कि किसान केवल फसल बेचकर ही नहीं, बल्कि अपनी उपज से नए उत्पाद तैयार कर भी कमाई बढ़ा सकता है।

खेती के साथ फूड प्रोसेसिंग सीखी, उपज की कीमत बढ़ाई
राजकुमारी देवी ने खेती को सिर्फ पारंपरिक तरीके से करने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने पूसा स्थित कृषि संस्थान और कृषि विज्ञान केंद्र से खेती तथा फूड प्रोसेसिंग का प्रशिक्षण लिया। इसके बाद पपीता समेत कई नकदी फसलों की खेती पर जोर दिया और उनसे अचार, मुरब्बा तथा दूसरे मूल्यवर्धित खाद्य उत्पाद तैयार करने लगीं। इस बदलाव ने खेती को उनके लिए सिर्फ जीविका का साधन नहीं रहने दिया, बल्कि आय बढ़ाने का माध्यम बना दिया। उनका अनुभव बढ़ा तो उन्होंने इसे अपने तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने दूसरी ग्रामीण महिलाओं को भी खाद्य उत्पाद बनाने, उन्हें बेहतर तरीके से तैयार करने और बाजार तक पहुंचाने के तरीके बताने शुरू किए। स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को जोड़कर उन्होंने उन्हें अपने हुनर से कमाई करने का रास्ता दिखाया। धीरे-धीरे उनके साथ जुड़ने वाली महिलाओं की संख्या बढ़ती गई और कई परिवारों के लिए यह काम अतिरिक्त आय का जरिया बन गया।

‘किसान चाची’ नाम ने दिलाई पहचान, पद्मश्री से हुआ सम्मान
खेती और ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने के उनके प्रयासों ने उन्हें गांव की सीमाओं से बाहर पहचान दिलाई। बिहार सरकार ने उन्हें ‘किसानश्री’ सम्मान से सम्मानित किया। इसके बाद लोग उन्हें प्यार से ‘किसान चाची’ कहने लगे। वर्ष 2019 में भारत सरकार ने खेती और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। उनकी कहानी राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में आई और उन्हें लोकप्रिय टीवी क्विज शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में भी आमंत्रित किया गया। वहां उन्होंने अपने संघर्ष और सफलता की कहानी साझा की। उनका मानना है कि किसान को सिर्फ उत्पादन पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। अगर उपज का बाजार नहीं मिल रहा है तो उसे खराब होने देने के बजाय उससे दूसरे उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। इस सोच ने उनके काम को एक अलग दिशा दी और फसल में मूल्य जोड़ने की संभावनाओं को सामने रखा।
एक महिला की जिद बनी हजारों महिलाओं के लिए उम्मीद
राजकुमारी देवी की कहानी सिर्फ एक किसान के सफल होने की कहानी नहीं है। यह उस जिद की कहानी है, जिसने मुश्किल परिस्थितियों के बीच रास्ता बनाया। जिस महिला के सामने कभी आर्थिक तंगी, सामाजिक ताने और बाजार की कमी जैसी चुनौतियां थीं, उसी ने आगे चलकर दूसरी महिलाओं को अपने पैरों पर खड़े होने का रास्ता दिखाया। उनका संदेश है कि हर महिला के पास कोई न कोई हुनर जरूर होता है, जरूरत सिर्फ उसे पहचानने और सही तरीके से इस्तेमाल करने की है। उन्होंने अपने जीवन में मिले अवसरों को धीरे-धीरे काम में बदला और अनुभव को दूसरों तक पहुंचाया। आज ‘किसान चाची’ की पहचान केवल खेती करने वाली महिला के तौर पर नहीं, बल्कि आत्मनिर्भरता और महिला सशक्तिकरण की प्रेरक मिसाल के रूप में है। उनकी यात्रा बताती है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़ी पूंजी की जरूरत नहीं होती।
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