खेती के सामने चुनौती बड़ी है। मिट्टी की ताकत घट रही है। मौसम भी तेजी से बदल रहा है। इसके बावजूद किसानों ने शानदार प्रदर्शन किया है। वित्त वर्ष 2016 से 2025 के बीच देश के कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों में 4.45 प्रतिशत की औसत दर से वृद्धि हुई है। यह पिछले कई दशकों की तुलना में सबसे बेहतर प्रदर्शन है। किसानों की मेहनत और मुश्किल हालात से लड़ने की क्षमता ने यह उपलब्धि हासिल की है। आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार देश के 46.1 प्रतिशत कार्यबल की आजीविका कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों पर निर्भर है। देश की नॉमिनल जीडीपी में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी 15.2 प्रतिशत है। भारत के पास दुनिया का सबसे बड़ा शुद्ध फसली क्षेत्र भी है।
खेत की मिट्टी कमजोर हो रही, लागत बढ़ रही
कृषि की इस सफलता के बीच एक चिंता भी है। खेतों में रसायनों के ज्यादा इस्तेमाल, लगातार सघन खेती और बदलते मौसम का असर मिट्टी पर पड़ रहा है। मिट्टी की उपजाऊ क्षमता कम होने से अब फसल उगाने के लिए पहले से ज्यादा खाद और पानी की जरूरत पड़ रही है। अत्यधिक गर्मी और बारिश भी फसलों को नुकसान पहुंचाती है। इसका सीधा असर किसानों की लागत और आमदनी पर पड़ता है। खासकर छोटे किसानों के लिए खेती अधिक जोखिम वाली होती जा रही है। कीटनाशकों के अत्यधिक और अनियंत्रित इस्तेमाल को लेकर भी चिंता है। विभिन्न अध्ययनों में कृषि श्रमिकों में डीएनए क्षति, हार्मोन में बदलाव और कमजोर प्रतिरोधक क्षमता जैसी समस्याओं की आशंका सामने आयी है। कई तरह के कैंसर के साथ भी कीटनाशक के संपर्क का संबंध पाया गया है। ऐसे में खेती में रसायनों के संतुलित इस्तेमाल की जरूरत बढ़ गयी है।

मिट्टी को फिर से ताकत देने वाली खेती पर जोर
अब मिट्टी को दोबारा उपजाऊ बनाने के लिए ‘पुनर्योजी कृषि’ पर जोर दिया जा रहा है। आसान भाषा में कहें तो यह ऐसी खेती है, जिसमें सिर्फ फसल पैदा करना ही लक्ष्य नहीं होता, बल्कि खेत की मिट्टी को भी स्वस्थ बनाया जाता है। इसमें खेत की कम जुताई की जाती है, ताकि मिट्टी की प्राकृतिक संरचना बनी रहे। जमीन को घास या फसल के अवशेषों से ढककर रखा जाता है। बारहमासी पौधों की जड़ों को बचाया जाता है। खेती के साथ पशुपालन को जोड़ने और रसायनों का कम से कम इस्तेमाल करने पर जोर रहता है। टिकाऊ खेती जहां मौजूदा स्थिति को बनाए रखने पर केंद्रित रहती है, वहीं पुनर्योजी कृषि मिट्टी की सेहत को पहले से बेहतर बनाने का प्रयास करती है। देश में ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा दिया जा रहा है। इससे पानी की बर्बादी कम होती है और कम पानी में फसल बचायी जा सकती है। प्राकृतिक खेती में रसायनों की जगह गोबर और गोमूत्र से तैयार जैविक खाद और कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाता है। इंटीग्रेटेड फार्मिंग में खेती के साथ दूसरे काम जोड़े जाते हैं, ताकि एक फसल खराब होने पर किसान की पूरी आमदनी प्रभावित न हो। हरी खाद, कवर क्रॉपिंग और मल्चिंग से भी मिट्टी की नमी और पोषक तत्व बचाने में मदद मिलती है।
सरकार की योजनाओं से किसानों को मिल रही मदद
मिट्टी और खेती बचाने के लिए सरकार कई योजनाएं चला रही है। राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन 2024 में शुरू किया गया। इसके तहत प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को दो वर्षों तक हर साल 4,000 रुपये प्रति एकड़ की मदद दी जाती है। मार्च 2026 तक करीब 18.19 लाख किसान इस मिशन से जुड़ चुके हैं। परंपरागत कृषि विकास योजना के तहत जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए किसानों को तीन वर्षों में 31,500 रुपये प्रति हेक्टेयर की वित्तीय सहायता दी जाती है। इसके तहत 16.90 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में जैविक खेती हो रही है। ‘हर बूंद अधिक फसल’ योजना के तहत सूक्ष्म सिंचाई लगाने पर छोटे और सीमांत किसानों को 55 प्रतिशत तथा अन्य किसानों को 45 प्रतिशत सब्सिडी मिलती है। वहीं मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना के तहत हर दो वर्ष में किसानों को उनकी जमीन की मिट्टी की जांच रिपोर्ट दी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार खेती को लंबे समय तक फायदे का काम बनाए रखने के लिए अच्छी उपज के साथ मिट्टी की सेहत बचाना भी जरूरी है। किसान रसायनों का संतुलित इस्तेमाल, पानी की बचत और मिट्टी की नियमित जांच जैसे उपाय अपनाकर खेती की लागत घटा सकते हैं और खेत की उत्पादकता को लंबे समय तक बनाए रख सकते हैं।