क्या है सोन नदी विवाद
सोन नदी के पानी के बंटवारे की नींव साल 1973 के बाणसागर समझौते में रखी गई थी, जो अविभाजित बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के बीच हुआ था. इसके तहत अविभाजित बिहार को 7.75 मिलियन एकड़ फीट (MAF) जल का आवंटन किया गया था. फिर इसके बाद साल 2000 में बिहार से झारखंड अलग हुआ और झारखंड गठन के बाद दोनों राज्यों के बीच यह अंतरराज्यीय विवाद शुरू हुआ. झारखंड का तर्क था कि सोन नदी का उद्गम क्षेत्र और एक बड़ा कैचमेंट एरिया उसके भौगोलिक दायरे में आता है, इसलिए उसे पानी में उचित हिस्सा मिलना चाहिए. वहीं, पूर्व में हिस्सेदारी स्पष्ट न होने के कारण झारखंड सरकार इंद्रपुरी जलाशय परियोजना के लिए सहमति पत्र (NOC) नहीं दे रही थी, जिससे यह परियोजना पिछले 53 वर्षों से रुकी हुई थी. लेकिन अब नए समझौते के तहत अविभाजित बिहार के 7.75 MAF पानी के कोटे में से बिहार को 5.75 MAF और झारखंड को 2.0 MAF पानी आवंटित किया गया है.
कहां-कहां बहती है नदी
लंबे समय तक मामला विवादित रहा. आपको बता दें कि सोन नदी मध्य भारत की एक प्रमुख और बारहमासी नदी है, जिसकी कुल लंबाई 784 किलोमीटर है. इसका उद्गम छत्तीसगढ़ के पेंड्रा (गौरेला-पेंड्रा-मरवाही), अमरकंटक पहाड़ी के पास सोनमुड़ा से होता है. छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से होकर यह नदी झारखंड के गढ़वा और पलामू जिलों से होकर बहती है. इसके बाद यह बिहार में प्रवेश करती है. बिहार में प्रवेश करने के बाद यह नदी रोहतास, औरंगाबाद, अरवल, भोजपुर, बक्सर और पटना जिलों से गुजरती है. बिहार के लिए यह नदी बेहद महत्वपूर्ण है. बिहार में यह भोजपुरी और मगही भाषा क्षेत्रों के बीच प्राकृतिक सीमा का निर्माण करती है. अंत में, पटना जिले के मनेर के पास यह गंगा नदी में मिल जाती है. इस नदी के किनारे देहरी, दाउदनगर, अरवल, कोइलवर और रोहतासगढ़ जैसे प्रमुख कृषि व शहरी केंद्र स्थित हैं.
विवाद की वजह
दरसअल पहले मॉनसून सीजन के बाद नदी में स्थित नहर प्रणाली में पानी का बहाव धीमा हो जाता था क्योंकि पानी का स्पष्ट बंटवारा नहीं हुआ था. इसके कारण सिंचाई और पेयजल के लिए पानी का संकट हो जाता था. झारखंड की ओर से एनओसी न मिलने के कारण जल भंडारण के लिए जलाशय का निर्माण नहीं हो पा रहा था, जिससे दक्षिण बिहार के मैदानी इलाकों और झारखंड के पठारी क्षेत्रों में सिंचाई व पेयजल का भारी संकट बना रहता था. इससे किसानों को परेशानी होती थी और पानी का समुचित इस्तेमाल भी नहीं हो पाता था.

इंद्रपुरी जलाशय परियोजना
सोन नदी के पानी के समुचित इस्तेमाल के लिए बिहार के रोहतास जिले में सोन नदी पर 1,407 मीटर लंबा इंद्रपुरी बराज (सोन बराज) स्थित है, जिसका निर्माण 1960 के दशक में हुआ था और 1968 में इसे चालू किया गया था. यह दुनिया के सबसे लंबे बराजों में से एक है. अब इस बराज को एक पूर्ण जलाशय में बदलने की महत्वाकांक्षी योजना है. यह जलाशय झारखंड के गढ़वा जिले के कड़वन और बिहार के रोहतास जिले के मतीवान के बीच बनाने का प्रस्ताव है. इस विशाल जलाशय की भंडारण क्षमता 4,170 मिलियन क्यूबिक मीटर होगी. परियोजना के तहत एक जलविद्युत संयत्र भी स्थापित करने का प्लान है. जिससे लगभग 300 मेगावॉट (MW) बिजली का उत्पादन होगा.
बिहार और झारखंड के किसानों को होगा फायदा
इंद्रपुरी जलाशय परियोजना के पूरा हो जाने का लाभ झारखंड और बिहार दोनों राज्यों के किसानों को होगा. इस समझौते से बिहार और झारखंड के ग्रामीण इलाकों के लाखों किसानों को सिंचाई और पेयजल की स्थायी सुविधा मिलेगी. इस परियोजना के बन जाने से बिहार के आठ जिले भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमर (भबुआ), औरंगाबाद, अरवल, पटना और गया (गया जी) के विस्तृत कृषि क्षेत्रों में नियमित सिंचाई की सुविधा मिलेगी. इसके साथ ही झारखंड के पठारी क्षेत्रों में पड़ने वाले जिले गढ़वा और पलामू के किसानों को सिंचाई के लिए पानी मिलेगा. बता दें कि गढ़वा और पलामू दोनों की सूखे से प्रभावित इलाके हैं.
सोन-फल्गु रिवर लिंक
इस समझौते से प्रस्तावित सोन-फल्गु नदी जोड़ परियोजना को भी गति मिलेगी. इससे गया जिले में जल उपलब्धता बढ़ेगी और पितृपक्ष मेले के दौरान फल्गु नदी में तर्पण व पिंडदान के लिए श्रद्धालुओं को पर्याप्त जल मिल सकेगा. साथ ही सूखे की मार झेलने वाले दक्षिण बिहार और झारखंड के पठारी क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता बढ़ने के साथ-साथ औद्योगिक विकास और पेयजल सुरक्षा सुनिश्चित होगी.