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Panchayat Darpan

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रांचीः बुढ़मू के बाड़े में ग्रामीणों ने पूर्वजों को किया तर्पण, सुख और समृद्धि का मांगा आशिर्वाद

बता दें कि सनातन धर्म में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की 15-16 दिनों की अवधि को पितृ पक्ष या महालया श्राद्ध पक्ष के नाम से जाना जाता है। यह समय दिवंगत पूर्वजों (पितरों) को याद करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनकी आत्मा की शांति व मोक्ष के लिए पिंडदान, तर्पण तथा दान-पुण्य करने के लिए समर्पित माना गया है। वर्ष 2026 में पितृ पक्ष का आरंभ 26-27 सितंबर से होकर 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा।

 

पितृ पक्ष का धार्मिक महत्त्व एवं ‘पितृ ऋण’

शास्त्रों के अनुसार, ‘श्रद्धापूर्वक किए गए कर्म’ को ही श्राद्ध कहा जाता है। हिंदू मान्यताओं में प्रत्येक मनुष्य पर अपने पूर्वजों का एक पवित्र सामाजिक और आध्यात्मिक कर्ज होता है, जिसे ‘पितृ ऋण’ कहा जाता है। माना जाता है कि जब सूर्य कन्या राशि में प्रवेश करते हैं, तो यमराज पितरों की आत्माओं को मुक्त कर देते हैं और वे सूक्ष्म रूप में अपने वंशजों के घर पधारते हैं। धर्म ग्रंथों और पुराणों के अनुसार, देव और पितर गंध, रस तथा तन्मात्राओं से बने सूक्ष्म शरीर वाले होते हैं। इसलिए वे अर्पण किए गए स्थूल भोजन के बजाय अन्न-जल के सार तत्व से ही तृप्त होते हैं। विधि-विधान से श्राद्ध करने पर पितर प्रसन्न होकर अपने वंश को सुख, शांति, समृद्धि, धन, ज्ञान, दीर्घायु और खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं।

 

पौराणिक मान्यताएँ और कथाएँ

पितृ पक्ष की शुरुआत और इसके महत्त्व को लेकर शास्त्रों में कई पौराणिक कथाएँ वर्णित हैं। एक कथा के अनुसार महाभारत युद्ध में दानवीर कर्ण की मृत्यु के पश्चात जब उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंची, तो उन्हें भोजन के स्थान पर सोना और आभूषण परोसे गए। जब कर्ण ने इसका कारण पूछा, तो देवराज इंद्र ने बताया कि उन्होंने जीवनभर सोना-चांदी तो दान किया, लेकिन कभी अपने पूर्वजों के नाम से अन्न और जल का दान नहीं किया। तब कर्ण को 15 दिनों के लिए पृथ्वी पर वापस भेजा गया ताकि वे अपने पितरों के निमित्त अन्न और जल का तर्पण कर सकें; इन्हीं 15 दिनों को पितृ पक्ष कहा गया।

 

गयासुर और गया धाम की कथा

श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, गयासुर नामक असुर ने कठिन तपस्या कर ब्रह्माजी से वरदान प्राप्त किया कि उसके दर्शन मात्र से पापी भी मोक्ष पा लेंगे। इससे स्वर्ग-नरक की व्यवस्था प्रभावित होने लगी, तब भगवान विष्णु ने गयासुर के वक्षस्थल पर यज्ञ किया। भगवान विष्णु ने प्रसन्न होकर वरदान दिया कि जो भी व्यक्ति गया धाम आकर अपने पितरों के लिए पिंडदान या प्रार्थना करेगा, उसके पितरों को तुरंत मुक्ति मिल जाएगी। गया में स्थित प्रेत शिला पर्वत पर अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए पितरों के लिए पिंडदान का विशेष विधान है, जहाँ दरारों और छिद्रों से सूक्ष्म आत्माएँ तर्पण स्वीकार करती हैं