बिहार सरकार ने कृषि भूमि को गैर-कृषि उपयोग में बदलने से संबंधित वर्ष 2010 के कानून को निरस्त कर दिया है। राज्यपाल ने 4 जुलाई 2026 को संविधान के अनुच्छेद 213 के तहत बिहार कृषि भूमि (गैर-कृषि प्रयोजनों के लिए सम्परिवर्तन) (निरसन) अध्यादेश, 2026 जारी किया। 7 जुलाई को प्रकाशित बिहार गजट के अनुसार यह अध्यादेश राजपत्र में प्रकाशन की तारीख से प्रभावी हो गया। सरकार ने पुराने कानून की समीक्षा के बाद इसे हटाने के पीछे अपेक्षित राजस्व नहीं मिलना, Ease of Doing Business, Ease of Living और तेजी से औद्योगिकीकरण के रास्ते में आ रही बाधाओं को प्रमुख कारण बताया है।
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समीक्षा में सामने आईं ये वजहें
2010 का कानून कृषि भूमि को गैर-कृषि प्रयोजनों के लिए परिवर्तित करने और उससे जुड़े मामलों को नियंत्रित करता था। बिहार सरकार ने विभिन्न विभागीय बैठकों में इसके प्रावधानों, प्रभाव और क्रियान्वयन की समीक्षा की। सरकार के मुताबिक समीक्षा में पाया गया कि कानून से राज्य को उम्मीद के अनुरूप राजस्व नहीं मिल रहा था। साथ ही इसके कारण Ease of Doing Business और Ease of Living के लक्ष्यों तथा तेजी से औद्योगिकीकरण की दिशा में कुछ बाधाएं सामने आ रही थीं। राज्य विधानसभा का सत्र नहीं चल रहा था, इसलिए तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता को देखते हुए राज्यपाल ने अध्यादेश जारी किया।
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किसानों और जमीन मालिकों के लिए इसका क्या अर्थ है?
इस फैसले को समझने के लिए एक साधारण उदाहरण लिया जा सकता है। मान लीजिए किसी किसान की जमीन कृषि उपयोग में दर्ज है और वह उस पर कोई गैर-कृषि गतिविधि करना चाहता है। पहले ऐसी जमीन के गैर-कृषि उपयोग से जुड़े मामलों को 2010 के कानून के तहत नियंत्रित किया जाता था। अब वह कानून ही निरस्त हो चुका है। लेकिन इस अध्यादेश में यह नहीं कहा गया है कि कृषि भूमि अब स्वतः किसी भी गैर-कृषि उपयोग में लाई जा सकेगी। यानी सिर्फ पुराने कानून के खत्म होने को जमीन के उपयोग की सभी कानूनी पाबंदियां खत्म हो जाने के रूप में पढ़ना सही नहीं होगा। इस दस्तावेज का स्पष्ट प्रावधान 2010 के कानून को निरस्त करना है, नई विस्तृत भूमि-परिवर्तन प्रक्रिया इसमें नहीं दी गई है।
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उद्योगों के लिए क्या बदलेगा?
बिहार सरकार के नजरिए से इस कदम का बड़ा उद्देश्य औद्योगिक गतिविधियों के लिए प्रक्रियागत माहौल को बेहतर करना है। सरकार ने स्वयं पुराने कानून को Ease of Doing Business और तेजी से औद्योगिकीकरण से जोड़ते हुए इसकी समीक्षा की है। ऐसे में उद्योग या निवेशक वर्ग के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण संकेत माना जा सकता है। हालांकि, इस अध्यादेश के आधार पर यह कहना जल्दबाजी होगी कि अब उद्योगों को कृषि भूमि खरीदने या उसका उपयोग बदलने के लिए किसी अन्य कानून या अनुमति की जरूरत नहीं होगी। जमीन से जुड़े दूसरे लागू कानून और नियम इस अध्यादेश से स्वतः समाप्त नहीं होते।
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पुराने मामलों का क्या होगा?
अध्यादेश में इस संबंध में स्थिति स्पष्ट की गई है। 2010 के कानून के तहत पहले की गई किसी कार्रवाई पर निरस्तीकरण का असर नहीं पड़ेगा। लेकिन ऐसे सभी लंबित मामले, जो अभी अंतिम रूप से पूरे नहीं हुए हैं, समाप्त हो जाएंगे। यानी किसी व्यक्ति या संस्था का मामला पुराने कानून के तहत चल रहा था और उस पर अंतिम निर्णय नहीं हुआ था, तो अध्यादेश के लागू होने के बाद उस कार्यवाही का आगे जारी रहना संभव नहीं होगा।
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कुल मिलाकर बिहार सरकार ने कृषि भूमि के गैर-कृषि उपयोग से जुड़ी 2010 की कानूनी व्यवस्था को खत्म करने का फैसला किया है, जिसका घोषित उद्देश्य राजस्व व्यवस्था की समीक्षा के साथ उद्योग और निवेश के लिए प्रक्रियागत बाधाओं को कम करना है। लेकिन इसका अगला और ज्यादा महत्वपूर्ण चरण यह होगा कि कृषि भूमि के गैर-कृषि इस्तेमाल के लिए आगे कौन-सी कानूनी और प्रशासनिक व्यवस्था लागू होती है। फिलहाल उपलब्ध अध्यादेश उस नई व्यवस्था का विस्तृत खाका नहीं देता।
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