झारखंड मे्ं 70 फीसदी से अधिक ग्रामीण आबादी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है. लेकिन राज्य में सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है. झारखंड में कई नदियां भी बहती हैं जिससे किसानों के सिंचाई के लिए पानी मिलता है. झारखंड का अधिकांश भूभाग छोटानागपुर पठार पर स्थित है और यहां की नदियां कठोर चट्टानों से होकर बहती हैं. राज्य की प्रमुख नदियों में दामोदर, सुवर्णरेखा, उत्तरी कोयल, दक्षिणी कोयल, बराकर, मयूराक्षी, शंख और अजय शामिल हैं. इन नदियों को राज्य की एग्रीकल्चर इकोसिस्टम और जनजीवन का आधार है. लेकिन आज वर्षा की कमी, प्रदूषण और अतिक्रमण के कारण इन नदियों के बहाव पर असर पड़ रहा है. वर्षा की कमी और घटता जलस्तर जलवायु परिवर्तन के कारण राज्य में वर्षा के पैटर्न में भारी बदलाव आया है. प्रदूषण और अतिक्रमण से होने वाले नुकसान के साथ-साथ तेजी से बढ़ते औद्योगिकीकरण, अनियोजित शहरीकरण और अवैध अतिक्रमण ने झारखंड की नदियों को गंभीर खतरे में डाल दिया है.
बह जाता है पानी
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पलामू क्षेत्र में जहां 50 से 70 के दशक के बीच 1304.4 मिलीमीटर औसत वार्षिक वर्षा होती थी, वह 1997-07 में घटकर मात्र 830.4 मिमी रह गई है. पठारी और पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण करीब 80% वर्षा जल बहकर बर्बाद हो जाता है. इसके कारण गर्मियों में छोटी नदियाँ, तालाब और कुएं पूरी तरह सूख जाते हैं. पानी की तीव्र कमी से फसलें नष्ट हो जाती हैं, जिससे ग्रामीण किसानों को अपनी आजीविका के लिए अन्य राज्यों में पलायन करने पर मजबूर होना पड़ता है. झारखंड सिंचाई आयोग के अनुसार, राज्य में 36 लाख हेक्टेयर भूमि कृषि योग्य है, जिसमें से 12.25 लाख हेक्टेयर में सिंचाई की सुविधा प्रदान करना संभव है. हालांकि, वर्तमान में केवल 8.7% कृषि भूमि को ही सिंचाई की सुविधा मिल पाती है.
प्रदूषित होती नदिय़ां
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केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने राज्य की दामोदर, सुवर्णरेखा, बोकारो, जुमार, कारो, कोयल, उत्तरी कोयल और शंख सहित 8 नदियों के 207 किमी लंबे हिस्से को अत्यधिक प्रदूषित पाया है, जहां बीओडी (BOD) का स्तर सुरक्षित सीमा से अधिक 3.2 से 8.0 mg/l दर्ज किया गया है. औद्योगिक कचरे और फ्लाई एश के कारण दामोदर नदी कुछ स्थानों पर ‘जलीय मरुस्थल’ बन चुकी है, जहाँ जलीय विविधता पूरी तरह समाप्त हो गई है. इस प्रदूषित पानी के सीधे उपयोग से डायरिया, पेचिश, अल्सर और त्वचा रोग जैसी बीमारियां फैल रही हैं. लोगों को पीने के लिए भी शुद्ध पानी नहीं पा रहा है.
नदियों में बढ़ता अतिक्रमण
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रांची की हरमू नदी जैसी शहरी नदियां आज सीवेज, कचरे और अवैध अतिक्रमण के कारण अपना अस्तित्व खो रही हैं. भूजल के अत्यधिक दोहन और नदियों का बहाव कम होने से कुएं और चापाकल सूख रहे हैं. इसके कारण बचे हुए भूजल में आर्सेनिक, फ्लोराइड और आयरन की मात्रा खतरनाक स्तर तक बढ़ गई है, जिससे कैंसर, किडनी, हृदय रोग और फ्लोरोसिस जैसी गंभीर बीमारियाँ लोगों को अपनी चपेट में ले रही हैं.इन सबके अलावा सिंचाई पर भी असर पड़ रहा है क्योंकि घटते पानी के कारण किसानों को रबी के फसल सीजन के दौरान ही पानी की कमी होने लगती है.
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