भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने इस साल के मॉनसून के अपने पूर्वानुमान में कहा था की अल नीनों के प्रभाव से इस बार बारिश कम होगी या अनियमित होगी. भारत में मॉनसून का अनियमित होने का अर्थ होता है पूरी कृषि व्यवस्था पर असर पड़ना, क्योंकि यह देश में खरीफ सीजन का समय होता है जब बड़े पैमाने पर खाद्यान्न का उत्पादन होता है. इस साल मॉनसून की शुरुआत धीमी रही हालांकि कुछ राज्यों में मूसलाधार बारिश के कारण बाढ़ जैसे हालात भी देखने के लिए मिले. बता दें कि पूरे देश में कुल मिलाकर बारिश की कमी 12% (13 अगस्त तक) पर टिकी है. हालांकि यह आंकड़ खेतों की स्थिति को उजागर करने के लिए काफी नहीं है. पानी की कमी का असल संकट अब शुरू हो रहा है. क्योंकि धान, सोयाबीन और मक्का जैसी प्रमुख खरीफ फसलें अब अपने विकास के उस बेहद महत्वपूर्ण चरण में कदम रख चुकी हैं, जहां पानी की कमी सीधे उनकी पैदावार को प्रभावित करेगी. कृषि वैज्ञानिकों और मौसम विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले दो हफ्ते भारतीय कृषि की दिशा तय करने वाले साबित होंगे.
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पानी की कमी से जूझ रहे फसल उत्पाक जिले
बारिश के पैटर्न को देखें तो मध्य भारत में हुई बारिश ने पानी की कमी को लगभग लगभग पूरा कर लिया है क्योंकि यहां सामान्य से सिर्फ एक प्रतिशत कम बारिश हुई है.वहीं देश के अन्य कृषि प्रधान हिस्से पानी के लिए तरस रहे हैं. उत्तर-पश्चिम भारत में 11%, दक्षिण प्रायद्वीप में 20%, और पूर्व व पूर्वोत्तर भारत में सबसे भारी 27% की गिरावट दर्ज की गई है. बिहार में अभ तक सामान्य से 39% कम बारिश हुई है. पंजाब और पूर्वी उत्तर प्रदेश में 31% की कमी है. वहीं झारखंड में अब तक 25% और कर्नाटक व केरल में लगभग 21-22% तक बारिश कम हुई है. प्रमुख फसल उत्पादक जिलों में हुई कम बारिश साफ इशारा कर रही हैं कि इस साल कीमतें बढ़ सकती हैं. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार देश के सबसे प्रमुख धान उत्पादक 50 जिलों में से 40 जिले इस समय बारिश की कमी से जूझ रहे हैं. यही हाल अन्य फसलों का भी है – सोयाबीन का उत्पादन करने वाले शीर्ष 25 जिलों में से 21 जिलों, अरहर (तूर) के 21 में से 18 जिलों, और मक्के के शीर्ष 20 में से 16 जिलों में सूखे के हालात हैं.
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कमजोर पड़ सकता है मॉनसून
कृषि मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि बुवाई का सीजन लगभग खत्म हो चुका है और इस साल खरीफ फसलों का कुल बुवाई क्षेत्र पिछले साल की तुलना में 2% कम रहा है. धान की बुवाई 3.7% और मक्का व अरहर की बुवाई 4-4% तक घट गई है. अब जबकि नई बुवाई की कोई गुंजाइश नहीं बची है, पूरा दारोमदार केवल फसल की उत्पादकता और आने वाले दिनों में मिलने वाली नमी पर टिका है. मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि समस्या केवल कम बारिश की नहीं है, बल्कि उसके असमान वितरण की है. एक या दो दिन की भारी बारिश से पूरे सीजन की कमी पूरी नहीं की जा सकती है. यदि भारी बारिश के तुरंत बाद लंबा सूखा पड़ जाए, तो मिट्टी की नमी तेजी से खत्म होने लगती है. इस साल कुछ जिलों में बाढ़ आ गई है, तो कुछ इलाके लगातार बूंद-बूंद को तरस रहे हैं. मौसम विभाग (IMD) का अनुमान है कि अगस्त के दूसरे हिस्से में मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ सकती हैं क्योंकि मॉनसून ट्रफ फिर से हिमालय की तराई की तरफ बढ़ रहा है.
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जलवायु परिवर्तन का असर
यह स्थिति किसी एक साल की बात नहीं है, बल्कि एक बड़े जलवायु परिवर्तन का संकेत है. यनों से पता चलता है कि पिछले चार दशकों में भारत का मानसून और अधिक अनिश्चित हो गया है. देश की लगभग 55% तहसीलों में पिछले दशक में दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश में 10% से अधिक की वृद्धि देखी गई है, जबकि गंगा के मैदानी इलाकों, हिमालयी क्षेत्रों और पूर्वोत्तर के 11% क्षेत्रों में बारिश में 10% से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है. झारखंड में भी इस साल किसान चिंतित है. हालांकि उन्होंने धान की रोपाई तो कर दी है पर अब यह चिंता उन्हें सता रही है कि अगर बारिश में कमी आती है तो सीधा असर उनके उत्पादन और कमाई पर पड़ेगा, फिर रबी फसलों के लिए भी सिंचाई का संकट पैदा हो जाएगा.
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