प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना किसानों के लिए फसल खराब होने की स्थिति में आर्थिक सुरक्षा कवच के तौर पर शुरू की गई थी, लेकिन अब योजना से किसानों का जुड़ाव लगातार कम हो रहा है। खरीफ सीजन के आंकड़े बताते हैं कि महज दो साल में 73 लाख किसान योजना से बाहर हो गए। 2024 में 2.47 करोड़ किसान बीमित थे, जबकि 2026 में यह संख्या घटकर 1.74 करोड़ रह गई। यानी करीब 29.6% की गिरावट आई है। इसी अवधि में बीमित रकबा भी 310 लाख हेक्टेयर से घटकर 205.52 लाख हेक्टेयर रह गया। किसानों की सबसे बड़ी शिकायत फसल नुकसान के आकलन, क्लेम के भुगतान में देरी और वास्तविक नुकसान की तुलना में कम मुआवजा मिलने को लेकर है। किसानों का कहना है कि नुकसान के बाद उन्हें राहत पाने के लिए पटवारी से लेकर तहसील और कलेक्टर कार्यालय तक चक्कर लगाने पड़ते हैं।
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2020 में योजना स्वैच्छिक हुई, इसके बाद घटने लगी भागीदारी
फसल बीमा योजना की शुरुआत 2016 में हुई थी। शुरुआती वर्षों में अधिसूचित फसलों के लिए कर्ज लेने वाले किसानों के लिए बीमा कराना अनिवार्य था। किसान की फसल बिक्री का भुगतान खाते में आते ही बैंक प्रीमियम की राशि काट लेते थे। वर्ष 2020 में केंद्र सरकार ने योजना को स्वैच्छिक कर दिया। इसके बाद किसानों की भागीदारी में लगातार कमी देखने को मिली। 2023 में देश में 3.14 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि बीमित थी, जो अब करीब 2.18 करोड़ हेक्टेयर रह गई है। योजना के प्रचार-प्रसार पर पिछले 10 वर्षों में 664 करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं। इसके बावजूद किसानों का भरोसा बढ़ने के बजाय कम होता दिखाई दे रहा है। योजना के तहत 18 बीमा कंपनियां सूचीबद्ध हैं, जिनमें पांच सरकारी कंपनियां हैं।

किसान बोझ कम, लेकिन क्लेम को लेकर सवाल ज्यादा
योजना में किसान खरीफ की खाद्यान्न और तिलहन फसलों के लिए बीमित राशि का अधिकतम 2% और रबी फसलों के लिए 1.5% प्रीमियम देता है। शेष प्रीमियम का बड़ा हिस्सा केंद्र और राज्य सरकारें वहन करती हैं। योजना से बाहर हुए किसानों का कहना है कि अपनी हिस्सेदारी का प्रीमियम देने के बावजूद नुकसान के समय मिलने वाला क्लेम कई बार अपेक्षा के अनुरूप नहीं होता। पहले फसल कटाई प्रयोग के आधार पर नुकसान का आकलन कर क्लेम तय किया जाता था। अब इसमें सैटेलाइट समेत तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है। किसानों का कहना है कि तकनीक आने के बावजूद प्रक्रिया आसान नहीं हुई है। नुकसान के बाद क्लेम के लिए अलग-अलग दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और भुगतान में भी देरी होती है।
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चार साल में आंकड़ों ने बताई तस्वीर, 2026 में क्लेम शून्य
खरीफ सीजन के आंकड़े योजना में किसानों की घटती भागीदारी की तस्वीर साफ करते हैं। 2023 में 2.40 करोड़ किसान और 314 लाख हेक्टेयर रकबा बीमित था। 2024 में किसान 2.47 करोड़ और रकबा 310 लाख हेक्टेयर रहा। 2025 में यह घटकर 2.01 करोड़ किसान और 249 लाख हेक्टेयर हो गया। 2026 में अब तक 1.74 करोड़ किसान और 205.52 लाख हेक्टेयर रकबा बीमित है। 2025 में 12,834 करोड़ रुपए प्रीमियम के मुकाबले 8,061 करोड़ रुपए का क्लेम मिला और 0.48% किसान लाभार्थी रहे। 2024 में 18,903 करोड़ प्रीमियम और 8,750 करोड़ क्लेम रहा। 2023 में 20,409 करोड़ प्रीमियम के मुकाबले 13,277 करोड़ रुपए क्लेम मिला। 2026 के आंकड़ों में अभी क्लेम और लाभार्थी शून्य दर्ज हैं। फसल बीमा कराने की अंतिम तारीख 16 अगस्त को समाप्त हो चुकी है। आंकड़े 20 अगस्त तक के हैं।
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