भारत में कृषि हमेशा से ही आजीविका और अर्थव्यवस्था का प्रमुख आधार रहा है. आज भी देश की 60 प्रतिशत से अधिक की आबादी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर है. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भारत जैसे देश में खेतों का, मिट्टी का और मौसम का सही रहना कितना जरूरी है. क्योंकि आधी से अधिक आबादी इस पर निर्भर है. लेकिन वर्तमान दौर में कृषि में कई तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. इनमें जलवायु परिवर्तन, घटती उत्पादकता और खराब होती मिट्टी की गुणवत्ता प्रमुख है. इन सब चुनौतियों को देखते हुए अब पर्यावरण अनुकूल खेती की चर्चा तेजी से हो रही है और स्थायी कृषि की बात हो रही है जिसे पुनर्योजी कृषि (Regenerative Agriculture) कहा जाता है.
पुनर्योजी कृषि (Regenerative Agriculture) क्या है?
रिजेनरेटिव एग्रीकल्चर खेती का एक ऐसा तरीका है जिसमें पर्यावरण को बिल्कुल नुकसान नहीं पहुंचाया जाता है, मिट्टी की सेहत को सुधारना और जैव विविधता को बढ़ावा देना इसका प्रुमख उद्देश्य है. आमतौर पर जब हम पारंपरिक या टिकाऊ खेती की बात करते हैं, जिसमें ध्यान केवल मौजूदा स्थिति को बनाए रखने पर होता है. लेकिन रिजेनरेटिव एग्रीकल्चर में ठीक इसके उलट जमीन की गुणवत्ता में लगातार सक्रिय रूप से सुधार करना और उसे समय के साथ अधिक उपजाऊ व समृद्ध बनाना होता है. इसका मतलब बहुत सरल है अगर हमारी मिट्टी स्वस्थ रहेगी तो हमारी फसल भी अधिक मजबूत और पौष्टिक होगी और मौसम की मार झेलने में सक्षम होगी.
क्या है इस खेती के नियम
- इस खेती का सबसे पहला नियम यह होता है कि मिट्टी में किसानों का दखल कम से कम किया जा सके. इस तरह की खेती में मिट्टी की जुताई कम से कम करना ताकि मिट्टी की प्राकृतिक संरचना बनी रहे.
- दूसरा नियम कहता है कि मिट्टी को कभी खुला नहीं छोड़ना चाहिए, हमेशा ढंककर रखना चाहिए, बल्कि मल्चिंग या फसलों को लगा कर इसे सुरक्षित रखना चाहिए.
- तीसरा नियम कहता है कि फसलों की जड़ों को मिट्टी में जीवित छोड़ देना चाहिए ताकि वे मिट्टी को बांधे रख सकें और मिट्टी को पोषण दे सकें.
- चौथा नियम कहता है कि पशुपालन को खेती से साथ जोड़े, कृषि कि प्रक्रिया में पशुओं को हिस्सा बनाएं.
रासायनिक खाद और कीटनाशकों पर निर्भरता कम करना. - खेत में अलग-अलग प्रकार की फसलें लगाना ताकी खेत की मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म तत्वों की संख्या को बढ़ाया जा सके.
भारत को इसकी जरूरत क्यों हैं
यह सवाल बेहद जरूरी है और खबर की शुरूआत में ही इसका जवाब लिखा जा चुका है. देखा जाए तो वित्त वर्ष 2016 से 2025 के दौरान भारतीय कृषि और उससे जुड़े क्षेत्रों ने 4.45% की शानदार दशकीय वृद्धि दर्ज की है, जो पिछले दशकों में सबसे अधिक रही है. लेकिन इस सफलता के साथ एक चिंताजनक पहलू भी है. लगातार गहन खेती और रसायनों के अत्यधिक उपयोग के साथ-साथ मौसम के बदलते मिजाज ने हमारी मिट्टी और कृषि उत्पादकता पर भारी दबाव डाल दिया है. इससे सबसे ज्यादा नुकसान हमारे छोटे और सीमांत किसानों को हो रहा है. रिजेनरेटिव एग्रीकल्चर इस संकट के लिए समाधान बन सकता है. क्योंकि यह केवल एक तकनीक नहीं है बल्कि पारंपरिक और वैज्ञानिक तरीकों का एक बेहतरीन जोड़ है.
इन तकनीकों का होता है इस्तेमाल
प्राकृतिक खेती : इसमें रसायनों के स्थान पर खेत पर ही तैयार किए गए प्राकृतिक जैविक इनपुट्स का उपयोग किया जाता है, जैसे बीजामृत, जीवामृत, घनजीवामृत, नीमास्त्र और दशपर्णी. साथ ही इसमें न्यूनतम जुताई, मल्चिंग और मिश्रित खेती को बढ़ावा दिया जाता है
सूक्ष्म सिंचाई : ड्रिप और स्प्रिंकलर प्रणालियों के जरिए पानी सीधे पौधों की जड़ों तक पहुंचाया जाता है, जिससे पानी की बर्बादी बेहद कम होती है.
मिट्टी की सेहत का प्रबंधन: हरी खाद और मल्चिंग के इस्तेमाल से मिट्टी में जैविक तत्वों की मात्रा बढ़ाई जाती है, जिससे नमी बनी रहती है और मिट्टी का कटाव रुकता है.
एकीकृत कृषि प्रणाली : फसलों के साथ-साथ पशुपालन, मत्स्य पालन, बागवानी, कृषि-वानिकी और मधुमक्खी पालन जैसी गतिविधियों को आपस में जोड़ा जाता है. इससे यदि कोई एक फसल खराब भी हो जाए, तो किसानों को अन्य स्रोतों से आमदनी मिलती रहती है.
कृषि-वानिकी (Agroforestry): फसलों के साथ पेड़ लगाना, जो अतिरिक्त आय देने के साथ-साथ कार्बन को सोखने और स्थानीय तापमान को नियंत्रित रखने में सहायक होते हैं
किसानों को होगा यह लाभ
कृषि की यह तकनीक किसानों को पर्यावरण दोनों को लाभ पहुंचाती है. सबसे पहला फायदा यह होता है कि किसानों को लागत में कमी आती है. महंगे रासायनिक खादों और कीटनाशकों की जरूरत न रहने से खेती का खर्च काफी कम हो जाता है, जिससे किसानों का मुनाफा बढ़ता है. स्वस्थ मिट्टी पानी को अधिक समय तक सोखकर रख सकती है, इससे सूखे के हालात में या अधिक बारिश में भी फसल बची रहती है. मिट्टी का बचाव होता है. मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की संख्या बढ़ती है.
सरकार की योजनाएं
भारत सरकार देश के किसानों के बीच इन पद्धियों को बढ़ावा देने के लिए कई प्रकार की योजनाएं चला रही हैं और वित्तीय सहायता प्रदान कर रही है. राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत प्राकृतिक खेती अपनाने वाले किसानों को 4,000 रुपये प्रति एकड़ प्रति वर्ष (अधिकतम दो साल के लिए और एक एकड़ की सीमा तक) की प्रोत्साहन राशि दी जाती है. मार्च 2026 तक देश में 18,786 प्राकृतिक कृषि क्लस्टर बनाए जा चुके हैं, जिनसे 18.19 लाख किसान जुड़कर 8.80 लाख हेक्टेयर भूमि पर खेती कर रहे हैं.
पर ड्रॉप मोर क्रॉप योजना: पानी के कम उपयोग के लिए ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई को बढ़ावा देने वाली इस योजना ने मई 2026 तक लगभग 109 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कवर कर लिया है, जिसके लिए 26,325 करोड़ रुपये की केंद्रीय सहायता दी जा चुकी है
वर्षा सिंचित क्षेत्र विकास कार्यक्रम: यह शुष्क और वर्षा पर निर्भर क्षेत्रों में एकीकृत खेती प्रणालियों को बढ़ावा देता है. इसके तहत दिसंबर 2025 तक राज्यों को 2,251.98 करोड़ रुपये की सहायता प्रदान की गई है, जिससे 15.73 लाख किसान लाभान्वित हुए हैं.
मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (Soil Health Card Scheme): वर्ष 2015 में शुरू की गई इस योजना के तहत किसानों को उनकी जमीन की मिट्टी की जांच रिपोर्ट दी जाती है. मार्च 2026 तक देश में लगभग 25.89 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड जारी किए जा चुके हैं.
इस तरह से कहा जा सकता है कि अगर कृषि कि इस तकनीक का सही तरीके से इस्तेमाल किया जाए और किसान खेतों में इसे प्रयोग करें तो तकनीक संकट के इस दौर में मददगार साबित हो सकती है. क्योंकि यह मिट्टी के साथ-साथ फसल, पर्यावरण और इंसानों की भी सेहत का ख्याल रखती है.