अल नीनो (El Niño) आज विश्व भर के मौसम वैज्ञानिकों की नींद उड़ा रहा है. इसके प्रभाव से भारत समेत कई देशों के मौसम का हाल बिगड़ने वाला है. अल नीनो प्रशांत महासागर की सतह के तापमान में होने वाले असामान्य बदलाव से जुड़ी एक बेहद प्रभावशाली वैश्विक जलवायु घटना है. स्पेनिश भाषा में ‘अल नीनो’ का अर्थ “छोटा लड़का” (Boy Child) या “बाल ईसा” (Christ Child) होता है, क्योंकि लातिन अमेरिकी मछुआरों ने पहली बार क्रिसमस के आसपास इस घटना को महसूस किया था.
कैसे बनता है अल नीनो
जब अल नीनो की स्थिति नहीं बनती है तब सामान्य स्थिति में , प्रशांत महासागर में पूर्व से पश्चिम (अमेरिका से एशिया की ओर) चलने वाली मजबूत ट्रेड विंड (Trade Winds) गर्म सतही पानी को पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र (इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया के पास) की ओर धकेलती हैं. इसके कारण पूर्वी प्रशांत (पेरू के तट के पास) में गहराई से ठंडा और पोषक तत्वों से भरपूर पानी ऊपर आता है, जिसे ‘अपवेलिंग’ (Upwelling) कहा जाता है. इस वायुमंडलीय चक्र को ‘वॉकर सर्कुलेशन’ (Walker Circulation) कहा जाता है, जो मानसून को संतुलित रखता है. लेकिन अल नीनो के दौरान, यह पूर्वी ट्रेड विंड कमजोर पड़ जाती हैं या विपरीत दिशा में बहने लगती हैं. इसके कारण पेरू के तट के पास ठंडे पानी का ऊपर आना बंद हो जाता है और भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान (SST) तेजी से बढ़ने लगता है. इससे वॉकर सर्कुलेशन कमजोर पड़ जाता है और वैश्विक स्तर पर हवा और बारिश के पैटर्न बदल जाते हैं. इसके अलावा जब मध्य और पूर्वी प्रशांत महासागर में तापमान की यह विसंगति सामान्य से 2°C से अधिक हो जाती है, तो इसे ‘सुपर अल नीनो’ या ‘अत्यंत तीव्र अल नीनो’ कहा जाता है. इस स्थिति में वॉकर सर्कुलेशन पूरी तरह ध्वस्त हो जाता है, जिससे अमेरिका में विनाशकारी बाढ़ और भारत, ऑस्ट्रेलिया तथा इंडोनेशिया जैसे देशों में गंभीर सूखा, जल संकट और भीषण गर्मी की स्थिति पैदा होती है.
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अल नीनो अतीत
ऐतिहासिक रूप से, अल नीनो ने दुनिया भर में महामारियों और महाविनाश को जन्म दिया है. करीब 150 साल पहले, प्रशांत महासागर में आए एक बड़े अल नीनो के कारण भारत के मद्रास प्रेसीडेंसी में ऐतिहासिक सूखा और अकाल पड़ा, जिसमें लगभग 2 करोड़ लोगों की मौत हो गई थी. इसी दौरान चीन में 2-3 करोड़ और ब्राजील में करीब 2 लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई थी. भारतीय मौसम विभाग (IMD) के पिछले 122 वर्षों (1901 के बाद से) के आंकड़ों का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि भारत ने कुल 22 अल नीनो वर्षों का सामना किया है, जिनमें से 16 वर्षों में देश को सामान्य से कम बारिश के कारण गंभीर सूखे जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ा है. भारत में 1902, 1905, 1951, 1965, 1972, 1982, 1987, 2002, 2004, 2009 और 2015 जैसे अल नीनो वर्षों में मानसून की बारिश में 10% से अधिक की भारी गिरावट दर्ज की गई थी. इनमें सबसे गंभीर मानसून गिरावट 1972 (-24%), 2002 (-22%), 1965 (-19%) और 2009 (-18%) में दर्ज की गई, जिन्होंने देश में विनाशकारी भुखमरी और अकाल के हालात पैदा किए थे. 2015-16 का सुपर अल नीनो इतिहास के सबसे मजबूत अल नीनो एपिसोड्स में से एक था, जिसके कारण पूरे भारत में मानसून में 14% की गिरावट आई और महाराष्ट्र के मराठवाड़ा क्षेत्र में 40% बारिश की कमी दर्ज की गई. इस दौरान भीषण हीटवेव के कारण भारत में 2,500 से अधिक लोगों की मौत हुई थी.
भारत में अल नीनो का असर
मौसम वैज्ञानिकों और वैश्विक एजेंसियों (WMO और NOAA) के अनुसार, वर्ष 2026 में अल नीनो की स्थिति खतरनाक रूप से तीव्र हो चुकी है, जिसके फरवरी 2027 तक बने रहने की संभावना लगभग 100% है. इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून की शुरुआत बेहद कमजोर रही. जून 2026 में सामान्य से 39.8% कम बारिश दर्ज की गई, जो 1901 के बाद से पांचवां सबसे सूखा जून था. इसके बाद, अगस्त 2026 में देश भर में 16% वर्षा की कमी दर्ज की गई, और यह मौसम विभाग के इतिहास में 1901 के बाद से सबसे गर्म अगस्त रहा. मौसम विभाग (IMD) ने सितंबर 2026 के लिए सामान्य से 91% कम बारिश का अनुमान जताया है. वहीं, WMO ने चेतावनी दी है कि यह संकट सर्दियों में भी तापमान को सामान्य से काफी ऊपर रखेगा.

हिंद महासागर डाइपोल
ऐसे में यह सवाल उठ रहे हैं कि क्या हिंद महासागर डाइपोल (IOD) बचा पाएगा? क्योंकि जब हिंद महासागर का पश्चिमी हिस्सा पूर्वी हिस्से से अधिक गर्म होता है (पॉजिटिव IOD), तो यह भारत में बारिश को बढ़ावा देता है और अल नीनो के प्रभाव को बेअसर कर देता है. जैसा कि 1997 में हुआ था, जब सदी का सबसे मजबूत अल नीनो आने के बावजूद मजबूत पॉजिटिव IOD ने भारत को सूखे से बचा लिया था. लेकिन 2026 में IOD वर्तमान में ‘न्यूट्रल’ (तटस्थ) अवस्था (-0.39) में है, जिससे जुलाई और अगस्त के मुख्य बुवाई महीनों में भारत को कोई प्राकृतिक सुरक्षा कवच नहीं मिल सका.
भारतीय कृषि पर असर
भारत की लगभग 51% कृषि सीधे तौर पर मानसून की बारिश पर निर्भर है. इस वजह से सुपर अल नीनो सीधे तौर पर हमारी खाद्य सुरक्षा को चुनौती दे रहा है. कम बारिश के कारण 10 जुलाई 2026 तक देश भर में खरीफ फसलों की बुवाई पिछले साल की तुलना में 16% कम (53.13 मिलियन हेक्टेयर बनाम पिछले वर्ष की समान अवधि में 63.27 मिलियन हेक्टेयर) दर्ज की गई. मुख्य रूप से धान, मक्का, दालें, कपास और सोयाबीन जैसी फसलें सबसे अधिक प्रभावित हुई हैं. केंद्र सरकार ने देश के 111 जिलों को अल नीनो के प्रति ‘अति-संवेदनशील’ (High-Priority) घोषित किया है क्योंकि यहाँ सिंचाई की कवरेज 25% से भी कम है. एक स्वतंत्र विश्लेषण के अनुसार, इन 111 जिलों में से 69 जिले पहले ही गंभीर रूप से बारिश की कमी का सामना कर रहे हैं. नागालैंड का लोंगलेन्ग जिला सबसे बुरी स्थिति में है, जहाँ मानसून की शुरुआत से केवल 0.2 मिमी बारिश हुई है, जो सामान्य (439.7 मिमी) से 99% कम है. इसके अलावा नागालैंड के जुन्हेबोटो, कर्नाटक का रामनगर और महाराष्ट्र का नंदुरबार जिला सूखे की कगार पर हैं. उत्तर भारत में सर्दियों का मौसम लगातार छोटा हो रहा है और फरवरी महीने में सबसे तेजी से 0.69°C प्रति दशक की दर से तापमान बढ़ रहा है. कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार, गेहूं की फसल के पकने के समय (फरवरी-मार्च) तापमान में मात्र 1°C की बढ़ोतरी से गंगा के मैदानी इलाकों में 40 से 50 लाख टन गेहूं का उत्पादन घट सकता है. इस साल सर्दियों के गर्म रहने के अनुमान के कारण गेहूं जैसी रबी फसलों की पैदावार में भारी गिरावट की आशंका है.
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भारतीय अर्थव्यवस्था और व्यापार पर अल नीनो का प्रभाव
कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था (जीवीए) का लगभग 18% हिस्सा है. अल नीनो का असर सिर्फ खेतों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है. ऐतिहासिक आंकड़ों के अनुसार, अल नीनो वर्षों में भारत की कृषि विकास दर (Agri GVA Growth) लगभग सपाट (Flat) हो जाती है, जो ला नीना वर्षों की तुलना में औसतन 3.5% (350 बेसिस पॉइंट्स) कम है. इसके कारण वित्त वर्ष 2027 (FY27) में देश की जीडीपी (GDP) वृद्धि दर घटकर 6.5% से 6.7% के बीच सिमटने की आशंका है. अल नीनो के कारण ग्रामीण आय घटने से ट्रैक्टर की बिक्री पर सबसे बुरा असर पड़ता है. अल नीनो वर्षों में ट्रैक्टर की बिक्री की वृद्धि दर घटकर महज 3.5% रह जाती है, जो सामान्य या ला नीना वर्षों में 10.7% तक होती है. इसके अलावा, छोटे एवं मध्यम उद्योगों (MSMEs) के लिए ऋण उठाव (Credit Offtake) में भी इस दौरान भारी गिरावट आती है. फसल उत्पादन घटने से खाद्य पदार्थों की कीमतों में भारी उछाल आता है। मजबूत अल नीनो वर्षों में खाद्य मुद्रास्फीति (Food Inflation) में औसतन 9% तक की वृद्धि देखी गई है. हालांकि ग्रामीण संकट बढ़ता है, लेकिन इस दौरान सोने पर ऋण (Gold Loans) और उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं (Consumer Durables) के लिए ऋण में वृद्धि दर्ज की जाती है. साथ ही तापमान बढ़ने से देश में बिजली की मांग (Peak Power Demand) रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच जाती है.
मानव स्वास्थ्य पर भीषण असर
डॉक्टरों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, सुपर अल नीनो केवल एक मौसम संबंधी विसंगति नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट है. जलवायु परिवर्तन के कारण 2026 में वैश्विक तापमान पहले से ही औद्योगिक क्रांति के स्तर से 1.4°C ऊपर चल रहा है और अल नीनो इसमें 1.4-1.5°C की अतिरिक्त वृद्धि कर रहा है, जिससे संयुक्त रूप से तापमान में करीब 2.9°C की ऐतिहासिक बढ़ोतरी हो रही है. पूर्व में अल नीनो के बाद देश के तापमान ने कई रिकॉर्ड तोड़े हैं, जैसे 2015 में राजस्थान के फलोदी में 51.0°C, 2024 में चूरू में 50.5°C और दिल्ली में 49.1°C तापमान दर्ज किया गया था. हाल के वर्षों में दिन के साथ-साथ रात के तापमान में भी भारी बढ़ोतरी देखी गई है. उदाहरण के लिए, दिल्ली में मई-जून के दौरान रात का तापमान 4.4°C तक बढ़ा और 24 रातें ऐसी रहीं जब पारा 30°C से ऊपर रहा. डॉक्टरों के अनुसार, गर्म रातें बेहद खतरनाक होती हैं क्योंकि यह मानव शरीर को दिन की गर्मी से उबरने (Recovery) का मौका नहीं देतीं, जिससे हीटस्ट्रोक और मौतों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है. भारत में लगभग 38 करोड़ मजदूर ऐसे क्षेत्रों में कार्यरत हैं जिन्हें सीधी धूप और गर्मी का सामना करना पड़ता है. तापमान में प्रत्येक 1°C की वृद्धि से इन कामगारों की दैनिक कमाई में 14% की कमी आती है, जबकि भीषण लू के दिनों में यह नुकसान 40% तक पहुँच जाता है. भारत में गर्मी के कारण हर साल होने वाली मौतों का स्वतंत्र अनुमान लगभग 1.5 लाख है. सूखे के कारण पेयजल संकट और दूषित पानी से डायरिया जैसी पेट की बीमारियां फैलती हैं. वहीं, दूसरी ओर अनियमित और बेमौसम भारी बारिश के कारण पैदा होने वाला जलजमाव डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया फैलाने वाले मच्छरों के लिए मुफीद माहौल तैयार करता है.