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Panchayat Darpan

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हर संकट से लड़कर कैसे खड़े हो जाते हैं गांव

कल्पना कीजिए एक दिन अचानक आपके शहर की बिजली चली जाए। बिजली गई तो पीने के पानी पर संकट, फोन बंद हुआ ऑनलाइन कुछ नहीं। आपके घर में अगर इंडक्शन पर खाना बनता है, तो चूल्हा जलने पर संकट। ऊंची इमारत में रहते हैं , तो आने और जाने में संकट मतलब बिजली का ना होना आपके लिए एक बड़ा खतरा है क्योंकि आपकी पूरी निर्भरता इसी पर है।

फर्क है गांव के जीवन में


अब गांव के जीवन की कल्पना कीजिए, बिजली रही तो ठीक नहीं रही तो क्या परेशानी होगी। गर्मी लगी तो घर के बाहर घने पेड़े के नीचे चटाई बिछ गई। खाना मिट्टी के चुल्हे पर बन गया। गांव में बिजली लग्जरी है जरूरत नहीं जबकि शहर में यह आपकी सबसे बड़ी जरूरत। शहर में आपका मजबूत वेतन ही आपकी ईएमआई चलाता है जिससे कार, घर, बच्चों की पढ़ाई और बड़े खर्च निपटते हैं। अगर नौकरी पर संकट हुआ, तो पूरे परिवार पर संकट आ जाता है लेकिन गांव में आपके खेत के अनाज का भंडार यह भरोसा देता है कि वह आपको भूखों मरने नहीं देगा। आपके गांव का घर ना किराया मांगता है, ना बड़ी मेंटेनेंस, गांव में ना सब्जियों का बड़ा खर्च है ना ईएमआई का खतरा।

हर बार बाढ़ से लड़ते हैं असम और बिहार के कई इलाके

गांव की ताकत को समझना हो तो बिहार या असम में आई बाढ़ से समझिए। असम में बाढ़ आई कई ग्रामीण इलाकों में संकट आ गया। पूरा देश इस वक्त असम के साथ खड़ा है। हम यहां असम की बात इसलिए कर रहे हैं क्योंकि गांव डूब भी गये तो दोबारा खड़े हो सकते हैं। यहां कई जुगाड़ है जिससे उन्हें खड़ा होने में समय नहीं लगेगा।

गांव के जुगाड़ ने बचा ली जान

असम के शिवसागर जिले के चारिंग गांव में बाढ़ आई। 97 वर्षीय महिला को बचाने के लिए सरकार की मदद का इंतजार नहीं किया गया केले के तनों से बनी अस्थायी नाव का सहारा मिला और जान बच गई। न नाव थी, न बचाव दल और न ही मदद के लिए कोई पड़ोसी। यह जिस परिवार की कहानी है उस परिवार की जीविका पूरी तरह पशुधन पर थी। उनका फार्म करीब 300 बकरियों, 500 बत्तखों, 1,000 मुर्गियों और मछलियों तक पहुंच गया। बाढ़ ने इस पूरी आजीविका को लगभग खत्म कर दिया। उनके पास पशुधन का बीमा भी नहीं था लेकिन इस परिवार को भरोसा है कि वह फिर मजबूती से खड़े होंगे।

सरकारी नौकरी पर संकट, खेती में कम होता मुनाफा और परिवार की छोटी होती जमीन : खतरे में ग्रामीण अर्थव्यवस्था

आप कल्पना कीजिए कि शहर में आपका सबकुछ नहीं बस एक अच्छी मासिक वेतन वाली नौकरी चली गई तो क्या करेंगे आप ? विशेषज्ञ बताते हैं कि बाढ़ असम के लिए नई बात नहीं है। समस्या यह है कि अब बाढ़ की आवृत्ति, तीव्रता और विस्तार पुराने सामान्य स्तर से आगे बढ़ रहे हैं। नदी के प्राकृतिक क्षेत्र में बढ़ती बसावट, जंगलों की कटाई, खनन, पहाड़ों की कटाई और ऐसी आधारभूत संरचनाएं जो स्थानीय जल-प्रवाह को ध्यान में रखकर नहीं बनाई गईं, स्थिति को और गंभीर बना रही हैं मतलब यह भी कि गांव में रहने वाले लोगों को पता है कि फिर एक साल बरसात के मौसम में उनका सबकुछ बिखर सकता है लेकिन वह हर साल यहां रहते हैं, गिरते हैं फिर खड़े होते हैं।

पीढ़ियां से मिलता है ज्ञान

इसकी वजह क्या है ? गांव की अपनी एक ज्ञान-व्यवस्था होती है। मौसम को समझने से लेकर खेत में कौन-सी फसल कब लगानी है, जंगल से कौन-सा खाद्य पदार्थ लिया जा सकता है और सामान्य बीमारी में कौन-सा घरेलू उपचार किया जा सकता है इसका ज्ञान अक्सर किताबों से नहीं, पीढ़ियों के अनुभव से आता है। यहां तक कि गांव में कई बार किसी समस्या का पहला समाधान अस्पताल या बाजार नहीं, बल्कि घर, खेत, जंगल और पड़ोस में मिल जाता है। बीमारी होने पर कई परिवार आज भी जड़ी-बूटी और पारंपरिक उपचार की ओर जाते हैं। किसी पौधे की पत्ती, छाल, जड़ या बीज का पारंपरिक इस्तेमाल किस तरह किया जाता है, यह जानकारी गांव के बुजुर्गों और स्थानीय पारंपरिक वैद्य के पास मिलती है।

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शहर अब ग्रामीण इलाकों के खानपान का महत्व समझ रहा है। झारखंड के कोल्हान प्रखंड में घोड़ा चावल होता है। इसकी डिमांड अब बढ़ रही है।रांची के मोरबादी में लगे ट्रेड एक्सपो में इस चावल को लेकर आई शालिनी ने बताया कि कैसे ब घरों में हर दिन दोपहर में घोड़ा चावल बनाकर खाते हैं। चावल तो छोड़िए इसका माड़ भी इतना स्वादिष्ट और लाभदायक है। पूर्वजों ने घोड़ा नाम इसलिए दिया, क्योंकि यह पौष्टिकता इतना भरपूर है। बाजार में इसी चावल को अंग्रेजी में ब्राउन राइस कहते हैं। शहर में ऑर्गेनिक प्रोडक्ट का एक बड़ा बाजार है। मड़वा (रागी) का महत्व समझा जा रहा है