देश में चीनी की बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार एक्शन मोड में आ गई है. त्योहारी सीजन शुरू होने वाला है और चीनी की मांग में तेजी आएगी ऐसे में चीनी की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए सरकार एहतियाती कदम उठा रही है. इस कदम के तहत सरकार ने लगभग एक दशक में पहली बार 10 लाख टन (1 मिलियन टन) कच्चे चीनी (raw sugar) के शुल्क-मुक्त (duty-free) आयात की अनुमति दी है, जिसकी समय-सीमा 31 अक्टूबर तक तय की गई है. इन सबके बीच गौर करने वाली बात यह है कि महज 9 महीने पहले ही सरकार ने अनुमान लगाया था की इस बार बंपर पैदावार होगी और सरकार ने 15 लाख टन चीनी निर्यात की अनुमति दी थी, जिसे बाद में बढ़ाकर 20 लाख टन कर दिया गया था. हालांकि, घरेलू बाजार में स्टॉक की कमी को देखते हुए इस निर्यात पर जल्द ही पाबंदी लगा दी गई और कुल स्वीकृत मात्रा में से केवल 8 लाख टन ही निर्यात हो सका. अब हालात यह हैं कि जितना निर्यात किया गया था, लगभग उतनी ही चीनी आयात करने की नौबत आ गई है.
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अचानक बढ़ी चीनी की कीमतें
घरेलू बाजार में पिछले दो महीनों के भीतर चीनी के दामों में लगभग 40 प्रतिशत की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यदि थोक कीमतों (Ex-mill prices) की बात करें, तो महाराष्ट्र सहित देश के विभिन्न हिस्सों में चीनी की कीमतें 5,400 रुपये से लेकर 5,560 रुपये प्रति क्विंटल तक पहुंच गई हैं. इसके अलावा, एस-ग्रेड (S-grade) चीनी की कीमत 5,750 रुपये और एम-ग्रेड (M-grade) की कीमत 5,850 से 5,900 रुपये प्रति क्विंटल (जीएसटी के बिना) दर्ज की गई है. इस संकट के पीछे सबसे बड़ी वजह चीनी के उत्पादन का गलत आकलन होना माना जा रहा है ‘इंडियन शुगर एंड बायो-एनर्जी मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन’ (ISMA) ने जुलाई 2025 में अनुमान लगाया था कि 2025-26 के सीजन में देश का चीनी उत्पादन 3.49 करोड़ टन रहेगा. लेकिन उसके बाद मार्च 2026 में ‘ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन’ (AISTA) ने इस अनुमान को घटाकर 2.83 करोड़ टन कर दिया. जबकि उद्योग के अंतिम अनुमानों के अनुसार, वास्तविक उत्पादन 2.8 करोड़ टन से भी नीचे (लगभग 2.79 करोड़ टन) आ गया. इसमें से करीब 24 लाख टन चीनी (सुक्रोज) को एथेनॉल बनाने के काम में डाइवर्ट कर दिया गया था. पूर्व कृषि सचिव सिराज हुसैन के अनुसार, यह अंतर दर्शाता है कि हमारी कृषि-तकनीक (agri-tech) अभी भी फसलों के उत्पादन का सटीक और विश्वसनीय अनुमान लगाने में पूरी तरह सक्षम नहीं है. उनके अनुसार, कम उत्पादन की स्थिति में निर्यात की अनुमति देना सरकार का एक गलत नीतिगत निर्णय (wrong judgement) हो सकता है.
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कालाबाजारी और जमाखोरी पर नकेल
कीमतों पर नियंत्रण और जमाखोरी रोकने के लिए सरकार ने चीनी आयात की अनुमति देने के साथ-साथ कई सख्त नियम भी लागू किए हैं. इसके तहत सरकार के नए आदेश के अनुसार जो थोक उपभोक्ता (जैसे कन्फेक्शनरी, कोल्ड ड्रिंक या मिठाई निर्माता) महीने में 10 टन से अधिक चीनी का उपयोग करते हैं, वे अब अधिकतम 15 दिनों की खपत के बराबर ही चीनी का स्टॉक रख सकेंगे. यह नियम 1 सितंबर से 30 नवंबर 2026 तक प्रभावी रहेगा. जबकि दूसरी तरफ चीनी मिलों को निर्देश दिया गया है कि वे बिक्री के 7 दिनों के भीतर चीनी की डिलीवरी (dispatch) सुनिश्चित करें. इसका उद्देश्य बिना वास्तविक चीनी भेजे केवल कागजों पर होने वाले लेन-देन और सट्टेबाजी को रोकना है.
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उद्योग जगत में मतभेद
चीनी संकट के असली कारणों को लेकर उद्योग के प्रतिनिधि एकमत नहीं हैं. ISMA के महानिदेशक दीपक बलानी का तर्क है कि देश में चीनी की कोई वास्तविक कमी नहीं है. उनके अनुसार, शुरुआत में कमजोर मानसून और अल नीनो के कारण आगामी फसल खराब होने की आशंका से बाजार में घबराहट पैदा हुई और थोक खरीदारों ने त्योहारों से पहले पैनिक बाइंग (घबराहट में खरीदारी) शुरू कर दी, जिससे कीमतें बढ़ीं. इसके अलावा, सीजन की शुरुआत में कोटा नियमों के उल्लंघन के कारण करीब 8 लाख टन अतिरिक्त चीनी बाजार में आ गई थी, जिससे शुरुआत में कीमतें उत्पादन लागत से भी नीचे चली गईं और बाद में अचानक बढ़ गईं. वहीं महाराष्ट्र के किसान नेता अनिल घनवत का मानना है कि सरकारी आंकड़ों में चीनी मिलों, गुड़ उत्पादकों और एथेनॉल संयंत्रों के बीच गन्ने की आवाजाही का सही हिसाब नहीं मिल पाता. अनुमानित गन्ने का एक बड़ा हिस्सा गुड़ और एथेनॉल में डाइवर्ट हो जाता है, जिससे चीनी का सटीक आकलन नहीं हो पाता है. इसके अलावा, गन्ने से चीनी निकालने की दर (recovery rate) भी कई मिलों में 12-12.5% से गिरकर 11-11.5% रह गई है
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बड़ी चुनौती क्या है
यह संकट स्पष्ट करता है कि भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में गन्ना किसानों, चीनी मिलों, आम उपभोक्ताओं, एथेनॉल उत्पादन और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन बनाना कितना जटिल है. भविष्य के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारत एक ऐसा वास्तविक और मजबूत चीनी बैलेंस शीट सिस्टम तैयार कर सकता है, जो फसल की बुआई से लेकर एथेनॉल डायवर्जन और खपत तक के हर आंकड़े की सटीक और रीयल-टाइम मॉनिटरिंग कर सके.
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