Skip to main content

Panchayat Darpan

|

संतान की लंबी आयु की कामना के साथ जीवित्पुत्रिका व्रत की शुरुआत, बुढ़मू प्रखंड के गांवों में धूमधाम से हो रही पूजा

संतान की लंबी उम्र, उत्तम स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य की मंगलकामना के साथ मनाए जाने वाले तीन दिवसीय महापर्व ‘जीवित्पुत्रिका’ (जितिया/जिउतिया) की शुरुआत नहाय-खाय की पारंपरिक रस्मों के साथ हो गई है। मातृत्व, अगाध आस्था और त्याग का प्रतीक माना जाने वाला यह अनुष्ठान विशेष रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। राजधानी रांची के बुढ़मू प्रखंड के गांवों में भी यह त्योहार मनाया जा रहा है। सभी माताएं अपने संतान की लंबी उम्र की कामना के साथ व्रत कर रही हैं. बुढ़मू प्रखंड के सभी गांव में जैसे ठाकुरगांव, करंजुआ टोली, कुलवे, सिदरोल, बाड़े, मनातू समेत कई गांवों में यह पर्व उत्साह के साथ मनाया जा रहा है.

3 अक्टूबर को 24 घंटे का कठोर निर्जला उपवास

पर्व के दूसरे दिन यानी शनिवार, 3 अक्टूबर को व्रती माताएं मुख्य निर्जला व्रत रखेंगी। शनिवार सुबह तड़के ब्रह्म मुहूर्त में ‘ओठगन’ (सरगही) के बाद व्रत का संकल्प लिया जाएगा। इसके बाद पूरे दिन और रात व्रती महिलाएं अन्न के साथ जल का भी पूर्ण त्याग करेंगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस कठोर साधना से संतान पर आने वाले सभी संकट टल जाते हैं और उन्हें दीर्घायु प्राप्त होती है। 

भगवान जीमूतवाहन और चिल्हो-सियारिन की होगी पूजा

अष्टमी के दिन शाम को प्रदोष काल में सामूहिक पूजा का आयोजन होगा। इस दौरान कुशा से निर्मित भगवान जीमूतवाहन और मिट्टी-गोबर से बनी चील व सियारिन की प्रतिमाओं की विधि-विधान से पूजा की जाएगी। व्रती महिलाएं एक साथ बैठकर पारंपरिक जीवित्पुत्रिका व्रत कथा का श्रवण करेंगी और संतान के मंगल की प्रार्थना करते हुए लाल-पीले सूती या रेशमी धागे से बनी ‘जिउतिया’ को गले में धारण करेंगी। 

 

4 अक्टूबर को सूर्योदय के बाद पारण

तीन दिवसीय इस धार्मिक अनुष्ठान का समापन रविवार, 4 अक्टूबर को पारण के साथ होगा। अष्टमी तिथि समाप्त होने के बाद व्रती महिलाएं स्नान-ध्यान कर, पितरों और ईष्ट देव को भोग अर्पित करने के उपरांत सात्विक अन्न-जल ग्रहण कर व्रत का समापन करेंगी। पर्व को लेकर बाजारों में पूजन सामग्री, फल, झिमनी के पत्ते और मड़ुआ आटे की दुकानों पर भारी चहल-पहल देखी जा रही है।