मछली उत्पादन में भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश, समुद्री खाद्य निर्यात ने बनाया नया रिकॉर्ड, लेकिन टैरिफ, जलवायु परिवर्तन और कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर भविष्य की राह में बड़ी चुनौती
भारत को जब कृषि प्रधान देश कहा जाता है, तो आमतौर पर तस्वीर में खेत, किसान और फसलें ही दिखाई देती हैं। लेकिन भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की एक दूसरी दुनिया भी है, जो खेतों से नहीं, बल्कि तालाबों, नदियों, झीलों और समुद्र से जुड़ी है। यही दुनिया आज देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार के लिए तेजी से महत्वपूर्ण होती जा रही है। यह क्षेत्र है मत्स्य पालन और जलीय कृषि (Aquaculture)।
पिछले एक दशक में भारत ने इस क्षेत्र में जिस गति से विस्तार किया है, वह अपने आप में उल्लेखनीय है। वित्त वर्ष 2013-14 में देश का कुल मछली उत्पादन 95.79 लाख टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 197.75 लाख टन हो गया। यानी करीब 106 प्रतिशत की वृद्धि। भारत अब दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है और वैश्विक मछली उत्पादन में करीब 8 प्रतिशत हिस्सेदारी रखता है। यह सिर्फ उत्पादन का आंकड़ा नहीं है। इसके पीछे करीब 3 करोड़ मछुआरों और मछली किसानों की आजीविका जुड़ी है। सरकार के अनुसार, 2014-15 के बाद विभिन्न योजनाओं और कार्यक्रमों के माध्यम से मत्स्य क्षेत्र में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से 74.66 लाख रोजगार के अवसर पैदा हुए हैं। यानी भारत की ‘ब्लू रिवोल्यूशन’ अब केवल मछली उत्पादन बढ़ाने की कहानी नहीं रही। यह रोजगार, ग्रामीण आय, खाद्य सुरक्षा और निर्यात की एक बड़ी आर्थिक कहानी बन चुकी है।
समुद्र से दुनिया की थाली तक पहुंचा भारत
भारत की इस कहानी का सबसे चमकदार हिस्सा उसका सीफूड (Sea-food) एक्सपोर्ट है। वित्त वर्ष 2023-24 में भारत ने रिकॉर्ड 17,81,602 मीट्रिक टन समुद्री खाद्य पदार्थों का निर्यात किया। इससे देश को करीब 7.38 अरब डॉलर यानी 60,523.89 करोड़ रुपये की आय हुई। अमेरिका और चीन भारतीय समुद्री खाद्य के प्रमुख बाजार रहे, जबकि फ्रोजन झींगा सबसे महत्वपूर्ण निर्यात उत्पाद बना रहा। भारत के समुद्री खाद्य निर्यात में झींगा की भूमिका सबसे अहम है। खासकर व्हाइटलेग श्रिंप ने देश के एक्वाकल्चर कारोबार को नई गति दी है। पिछले एक दशक में झींगा उत्पादन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और एक्वाकल्चर अब भारत के सीफूड कारोबार की रीढ़ बन चुका है। MPEDA के आंकड़ों के अनुसार, 2023-24 में भारत ने 7,16,004 टन फ्रोजन झींगा का निर्यात किया, जिसकी कीमत करीब 4.88 अरब डॉलर थी। यही वजह है कि अमेरिका, चीन, यूरोप, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे बाजारों में भारतीय झींगे की मांग लगातार बनी हुई है।
अमेरिका सबसे बड़ा बाजार, लेकिन निर्भरता भी सबसे बड़ा जोखिम
भारत के लिए अमेरिकी बाजार जितना बड़ा अवसर है, उतना ही बड़ा जोखिम भी बनता जा रहा है। 2025 में अमेरिकी टैरिफ बढ़ने के बाद भारतीय झींगा निर्यात पर कुल प्रभावी शुल्क 58.26 प्रतिशत तक पहुंच गया। क्रिसिल ने उस समय अनुमान लगाया था कि इससे भारतीय झींगा निर्यात की मात्रा में 15-18 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। यहीं भारत के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा होता है कि क्या दुनिया के सबसे बड़े बाजारों में से एक पर अत्यधिक निर्भर रहना समझदारी है?
इसका जवाब बाजारों के विविधीकरण में है। भारत अब चीन, यूरोप, जापान, मध्य-पूर्व और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे बाजारों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञ भी लंबे समय से अमेरिकी बाजार पर निर्भरता कम करने और वैल्यू-एडेड समुद्री उत्पादों पर जोर देने की बात कर रहे हैं। यह बदलाव इसलिए भी जरूरी है क्योंकि भविष्य में वैश्विक व्यापार केवल उत्पादन क्षमता से तय नहीं होगा। टैरिफ, भू-राजनीति, आपूर्ति श्रृंखला और खाद्य सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे।
सरकार की नीतियों से मिला सहारा
मत्स्य क्षेत्र के विस्तार में सरकारी योजनाओं की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ब्लू रिवोल्यूशन योजना, प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY), फिशरीज एंड एक्वाकल्चर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट फंड और अन्य योजनाओं के माध्यम से उत्पादन, इंफ्रास्ट्रक्चर, कोल्ड चेन, मत्स्य किसानों और निर्यातकों को समर्थन दिया गया है। 2025 में सरकार ने मछली के तेल, मछली के अर्क और तैयार या संरक्षित मछली एवं झींगा उत्पादों पर GST को 12 प्रतिशत से घटाकर 5 प्रतिशत किया। सरकार का उद्देश्य लागत कम करना और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय समुद्री उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाना था। लेकिन सरकारी मदद के बावजूद जमीन पर कई चुनौतियां अब भी मौजूद हैं।
असल चुनौती उत्पादन नहीं, पूरी वैल्यू चेन है
भारत ने उत्पादन बढ़ाने में बड़ी सफलता हासिल की है, लेकिन मछली को तालाब या समुद्र से बाजार तक पहुंचाने वाली पूरी वैल्यू चेन अभी भी कई जगह कमजोर है। कई क्षेत्रों में आधुनिक टेस्टिंग लैब की कमी है। निर्यात के लिए जरूरी गुणवत्ता जांच में देरी होने पर शिपमेंट प्रभावित हो सकता है। बंदरगाहों के आसपास स्वच्छता, आधुनिक फिश लैंडिंग सेंटर, कोल्ड स्टोरेज, आइस प्लांट और परिवहन जैसी सुविधाओं को और मजबूत करने की जरूरत है। प्रोसेसिंग प्लांट स्थापित करने की लागत भी कम नहीं है। अंतरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों को पूरा करने के लिए आधुनिक मशीनरी, स्वच्छता व्यवस्था, गुणवत्ता नियंत्रण और प्रमाणन की जरूरत होती है। इसके साथ बिजली, मजदूरी, लॉजिस्टिक्स और पैकेजिंग की बढ़ती लागत मुनाफे पर दबाव डालती है। यानी चुनौती सिर्फ यह नहीं है कि हम कितनी मछली पैदा करते हैं। सवाल यह है कि हम उसमें कितना मूल्य जोड़ पाते हैं। यहीं भारत को अगली छलांग लगानी होगी।

जलवायु परिवर्तन: टैरिफ से भी बड़ा खतरा
अमेरिकी टैरिफ तत्काल आर्थिक झटका दे सकता है, लेकिन मत्स्य क्षेत्र के सामने जलवायु परिवर्तन एक खतरा ऐसा है जो धीरे-धीरे पूरी व्यवस्था को बदल रहा है। समुद्र का बढ़ता तापमान, समुद्री पारिस्थितिकी में बदलाव, समुद्र के अम्लीकरण, समुद्र के बढ़ते जलस्तर और लगातार बदलते मौसम का सीधा असर मछलियों की उपलब्धता पर पड़ रहा है। पानी के तापमान में बदलाव के साथ मछलियों के वितरण और प्रवास के पैटर्न में भी बदलाव आता है। इसका सबसे ज्यादा असर छोटे और पारंपरिक मछुआरों पर पड़ता है, जिनके पास बड़े जहाजों और आधुनिक डीप-सी फिशिंग की क्षमता नहीं होती। मछली पकड़ने के लिए उन्हें अधिक दूरी तय करनी पड़ सकती है। इसका मतलब है अधिक ईंधन खर्च, अधिक समय और अधिक जोखिम। इसके साथ चक्रवात, बाढ़ और बेमौसम बारिश जैसी घटनाएं तटीय अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती हैं। नावों, जालों और अन्य उपकरणों को नुकसान पहुंचता है और खराब मौसम के कारण मछुआरों का काम लंबे समय तक प्रभावित हो सकता है।
समुद्र का स्वास्थ्य ही मछली कारोबार का भविष्य है
यह समझना होगा कि मछली उत्पादन केवल नावों और तालाबों से नहीं बढ़ेगा। इसके लिए स्वस्थ समुद्री और जलीय पारिस्थितिकी तंत्र भी जरूरी है। मैंग्रोव, प्रवाल भित्तियां (Coral Reefs), समुद्री घास और तटीय आर्द्रभूमियां मछलियों के प्रजनन और पालन के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं। इनका नुकसान सीधे मछली संसाधनों की उपलब्धता को प्रभावित कर सकता है। इसलिए ब्लू रिवोल्यूशन का अगला चरण केवल “More Fish” का अभियान नहीं होना चाहिए। यह “More Fish, Better Ecosystem” का अभियान होना चाहिए।
छोटे मछुआरे इस क्रांति के केंद्र में क्यों होने चाहिए?
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि मत्स्य क्षेत्र के विकास का लाभ आखिरी व्यक्ति तक पहुंचे। बड़ी कंपनियां आधुनिक तकनीक, कोल्ड चेन और अंतरराष्ट्रीय बाजार तक पहुंच बना सकती हैं। लेकिन छोटे मछुआरे और मछली किसान अभी भी मौसम, बाजार मूल्य, महंगे ईंधन, बीमारी, कर्ज और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझते हैं। विशेष रूप से महिलाओं की भूमिका को भी नए सिरे से देखने की जरूरत है। मछली की सफाई, प्रोसेसिंग, सुखाने, पैकेजिंग और स्थानीय बाजार से लेकर निर्यात मूल्य श्रृंखला तक बड़ी संख्या में महिलाएं काम करती हैं। उन्हें तकनीकी प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और सामाजिक सुरक्षा से जोड़ना जरूरी है।
अब अगली छलांग की जरूरत
भारत ने मत्स्य उत्पादन में बड़ी छलांग लगाई है। 95.79 लाख टन से करीब 198 लाख टन तक पहुंचना मामूली उपलब्धि नहीं है। सरकार की योजनाओं, किसानों की मेहनत, वैज्ञानिक अनुसंधान और निजी क्षेत्र के निवेश ने मिलकर इस बदलाव को संभव बनाया है। लेकिन अब लक्ष्य सिर्फ उत्पादन बढ़ाना नहीं हो सकता। भारत को उच्च मूल्य वाले समुद्री उत्पाद, बेहतर प्रोसेसिंग, आधुनिक कोल्ड चेन, अत्याधुनिक टेस्टिंग लैब, मजबूत लॉजिस्टिक्स और नए निर्यात बाजारों पर ध्यान देना होगा। साथ ही जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए जलवायु-सहिष्णु एक्वाकल्चर, बेहतर बीज, रोग नियंत्रण, मौसम पूर्वानुमान, डिजिटल तकनीक और समुद्री पारिस्थितिकी संरक्षण को मत्स्य नीति के केंद्र में लाना होगा। AI और IoT जैसी तकनीकें भी इस क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती हैं। पानी की गुणवत्ता की निगरानी, मछलियों के स्वास्थ्य, मौसम के पूर्वानुमान और संभावित फिशिंग जोन की पहचान जैसी गतिविधियों में डिजिटल तकनीक की भूमिका तेजी से बढ़ सकती है।
नीली क्रांति का अगला अध्याय
भारत के पास आज वह सब कुछ है, जो उसे दुनिया की अग्रणी सीफूड अर्थव्यवस्थाओं में शामिल कर सकता है—विशाल तटरेखा, लाखों हेक्टेयर अंतर्देशीय जल संसाधन, बड़ा घरेलू बाजार, विशाल श्रमबल, तेजी से विकसित होता एक्वाकल्चर सेक्टर और अंतरराष्ट्रीय बाजार में मजबूत पहचान। लेकिन इस ताकत को स्थायी सफलता में बदलने के लिए एक संतुलन जरूरी है।
- उत्पादन बढ़े, लेकिन पर्यावरण की कीमत पर नहीं।
- निर्यात बढ़े, लेकिन एक-दो बाजारों पर निर्भरता के साथ नहीं।
- आधुनिक तकनीक आए, लेकिन छोटे मछुआरे उससे बाहर न रह जाएं।
- निवेश बढ़े, लेकिन स्थानीय समुदायों की आजीविका भी सुरक्षित रहे।
भारत की असली नीली क्रांति तब पूरी होगी, जब समुद्र से निकलने वाली हर मछली सिर्फ एक निर्यात वस्तु नहीं, बल्कि किसी मछुआरे के बेहतर जीवन, किसी गांव की मजबूत अर्थव्यवस्था और देश की वैश्विक आर्थिक ताकत की कहानी बने। भारत आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक है। अब अगली चुनौती सिर्फ नंबर एक बनना नहीं है। चुनौती यह है कि भारत दुनिया का सबसे टिकाऊ, सबसे प्रतिस्पर्धी और सबसे भरोसेमंद सीफूड हब कैसे बने। यही भारत की Blue Revolution का अगला अध्याय होना चाहिए।