कभी घर की चारदीवारी तक सीमित रहने वाली झारखंड के गांडेय की महिलाएं अब अपने हुनर से परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत कर रही हैं। गांडेय स्थित दस्तकार संस्थान में जूट से उपयोगी और आकर्षक उत्पाद तैयार कर करीब 15 महिलाओं को रोजगार मिला है। महिलाएं सुबह 10 बजे से शाम 4 बजे तक काम करती हैं। काम के अनुसार प्रतिमाह करीब 5 से 8 हजार रुपए तक कमा रही हैं। संस्थान में जूट के वाटर बोतल थैले, लेडीज पर्स, शॉपिंग बैग, सब्जी थैले, डिजाइनर वॉल हैंगिंग, फाइल फोल्डर, द्वार तोरण, टिफिन बॉक्स, पैकिंग थैले और चूड़ी बॉक्स समेत 15 से 17 तरह के उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इनकी कीमत करीब 80 से 250 रुपए तक है। अनिता कुमारी, नजराना परवीन, आशा कुमारी, ललिता देवी, बेबी देवी, शिल्पा देवी, शबनम खातून, सीमा खातून, उषा देवी, पुष्पा देवी, पूजा कुमारी, सावित्री देवी और पूनम कुमारी समेत करीब 15 महिलाएं यहां काम कर रही हैं।


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3 मशीनों से शुरू हुआ काम अब 10 पर तक पहुंचा
संस्थान के संचालक शशांक शेखर बताते हैं कि सिंगल यूज प्लास्टिक से बढ़ते प्रदूषण को देखते हुए जूट उत्पाद तैयार करने की पहल शुरू की गई। शुरुआत में महज तीन मशीनें थीं। मांग बढ़ने के साथ अब 10 मशीनों पर काम हो रहा है। संस्थान आने वाले दिनों में मशीनों की संख्या बढ़ाकर 100 करने की तैयारी में है, ताकि ज्यादा महिलाओं को रोजगार से जोड़ा जा सके। पिछले महीने करीब 90 हजार रुपए के जूट उत्पादों की खुदरा बिक्री हुई। संस्थान को शुरुआत के दौर में ही सालाना 15 से 20 लाख रुपए के कारोबार की उम्मीद है। अब उत्पादों को बड़े बाजार तक पहुंचाने की तैयारी है। देवघर के बाबा बैद्यनाथ धाम में पेड़ा-प्रसाद और अन्य सामान की प्लास्टिक पैकिंग के विकल्प के तौर पर जूट के थैले उपलब्ध कराने की योजना है। गिरिडीह के मधुबन समेत अन्य धार्मिक स्थलों पर भी बिक्री की तैयारी चल रही है। दुकानों और मॉल में संस्थान के ब्रांड नाम से उत्पाद उपलब्ध कराने की योजना है।


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महिलाएं बोली- अब छोटी जरूरतों के लिए किसी पर निर्भर नहीं
प्रोजेक्ट मैनेजर पूजा ने बताया कि कई महिलाएं पहले घर तक सीमित थीं। अब रोजगार मिलने से वे परिवार के खर्च और बच्चों की जरूरतों में आर्थिक योगदान दे रही हैं। भविष्य में 100 से 200 महिलाओं को रोजगार से जोड़ने का लक्ष्य है। दस्तकार में काम कर रहीं आशा कुमारी और अनिता कुमारी ने बताया कि उन्हें एक जुलाई से जूट उत्पाद बनाने की ट्रेनिंग दी गई थी। कोलकाता से आए प्रशिक्षकों ने करीब 15 दिनों तक प्रशिक्षण दिया। इसके बाद 25 जुलाई से काम शुरू किया। दोनों के अनुसार, काम के आधार पर 5 से 8 हजार रुपए तक प्रतिमाह आमदनी हो रही है। रोजगार मिलने से आत्मनिर्भरता का एहसास हुआ है और छोटी-बड़ी जरूरतों के लिए अब दूसरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। दस्तकार की यह पहल एक ओर महिलाओं को हुनर और रोजगार दे रही है, वहीं दूसरी ओर प्लास्टिक के विकल्प के तौर पर पर्यावरण अनुकूल जूट उत्पादों को बाजार देने की दिशा में भी काम कर रही है।
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