Skip to main content

Panchayat Darpan

|

ओल की खेती से चार गुणा कमाई कर सकते हैं किसान, पढ़ें यहां खेती का बेहतरीन तरीका

ओल की खेती किसानों के लिए काफी मुनाफा देने वाली होती है. इस खेती की सबसे अच्छी बात यह होती है कि इसमें अधिक मेहनत नहीं करनी होती है साथ ही पूंजी भी कम लगती है. अगर आप भी ओल की खेती करना चाहते हैं तो झारखंड सरकार की योजना का लाभ उठाकर ओल की खेती कर सकते हैं. योजना के तहत ओल की खेती करने के लिए राज्य सरकार की तरफ से अनुदान भी दिया जाता है. यह उन किसानों के लिए फायदे का सौदा हो सकता है जो किसान वैकल्पिक खेती करना चाहते हैं. इसलिए ओल की खेती करने के इच्छुक किसान विभाग में जाकर आवेदन कर सकते हैं.

इसे भी पढ़ें: भारत की नीली क्रांति: बढ़ता उत्पादन, चमकता निर्यात और सामने खड़ी बड़ी चुनौतियां

झारखंड के पलामू और खूंटी जिले के कई इलाकों में ग्रामीण वैकल्पिक खेती के तौर पर अफीम की अवैध खेती करते हैं और इसके बाद पकड़े जाने पर उन्हें कानूनी पेचीदगियों का सामना करना पड़ता है. ऐसे में किसानों को इस परेशानी से बचाने के लिए और उन्हें कमाई का बेहतर विकल्प प्रदान करने के लिए उद्यान विभाग की तरफ से ओल की खेती करने के लिए किसानों को प्रोत्साहित किया जा रहा है. जिस इलाकों में ओल की खेती की जाती है उन इलाकों में ओल की खेती को बढ़ावा देने के लिए पहल की जा रही है. ताकि किसानों के पास वैध खेती का विकल्प रहे.

इसे भी पढ़ें:  केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने लॉन्च किया NSP, कृषि छात्रों को हर माह DBT से मिलेगी छात्रवृत्ति

ओल की खेती के बारे में जानकारी देते हुए पलामू जिला के उद्यान पदाधिकारी ने कहा कि किसानों को लगातार ओल की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है. इस साल भी इच्छुक किसानों के लिए सब्सिडी पर ओल के बीज उपलब्ध कराया जा रहा है. ओर की खेती करने के लिए प्रति हेक्टेयर दो से ढाई लाख रुपये की लागत आती है. जबकि बाजार में इसकी अच्छी कीमत मिलने पर किसान लागत से तीन गुणा अधिक तक कमाई कर सकते हैं. इस तरह से किसान ढाई लाख रुपये खर्च करने 10 लाख रुपये तक की कमाई कर सकते हैं. साथ ही कहा कि ओल की मांग बाजार में हमेशा बनी रहती है. जिला उद्यान पदाधिकारी ने बताया कि इस वित्त वर्ष के लिए जिले में लगभग 100 एकड़ में ओल की खेती करने का लक्ष्य रखा गया है.

इसे भी पढ़ें: झारखंड में बढ़ा मानव-हाथी संघर्ष, दो दशकों में 1300 से ज्यादा लोगों की मौत

जो किसान इस साल ओल की खेती करना चाहते हैं और जिन किसानों के पास ओल की खेती करने का अनुभव है वो किसान जिला उद्यान विभाग के कार्यालय में जाकर आवेदन कर सकते हैं. ओल की खेती के बारे में पर्याप्त जानकारी लेकर किसान अगर इसकी खेती करते हैं तो नुकसान के जोखिम को कम किया जा सकता है.

ओल की खेती से जुड़े फैक्ट

  • ओल की खेती के लिए 25-35°C तापमान वाली आर्द्र जलवायु और उत्तम जल निकास वाली जीवांश युक्त बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम मानी जाती है. मिट्टी का पीएच (pH) मान 6.0 से 7.0 के बीच होना चाहिए.
  • भारत में ‘गजेंद्र’ किस्म सबसे अधिक लोकप्रिय है क्योंकि यह बिना खुजली वाली और स्वादिष्ट होती है. इसके अलावा ‘श्री पद्म’, ‘कुसुम’ और ‘संतरागाछी’ भी अधिक पैदावार देने वाली प्रमुख किस्में हैं.
  • ओल की बुवाई का सबसे सही समय मार्च से जून के बीच का होता है. इसके लिए एक किलोग्राम तक के स्वस्थ कंद का उपयोग किया जाता है. इसके लगाने के लिए प्रत्येक टुकड़े में कम से कम एक कली होनी चाहिए.
  • मिट्टीजनित फंगस रोगों और सड़न से बचाने के लिए कंदों को गोबर के गाढ़े घोल, ट्राइकोडर्मा या कार्बेंडाजिम कवकनाशक के घोल से उपचारित करके छाया में सुखाना जरूरी है.
  • कंदों की बुआई के लिए 60x60x45 सेंटीमीटर के गड्ढे बनाएं और उसमें जैविक खाद और नीम की खली मिलाकर भरें.
  • ओल की बुआई के तुरंत बाद गड्ढों को पुआल, सूखे पत्तों या धान के भूसे से ढक दें. ध्यान दें की जलजमाव ओल की खेती का दुश्मन है इसलिए खेत में जलजमाव नहीं होने दें.

खेती किसानी, गांव और जलवायु से जुड़ी खबरों को पढ़ने के लिए हमें सपोर्ट करें.

इसे भी पढ़ें: पलामू में यूरिया-डीएपी की कालाबाजारी पर सख्ती, दुकानों की नियमित जांच के निर्देश