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Panchayat Darpan

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वनाधिकार कानून-2006 : झारखंड में 1.10 लाख में 61,970 को मिला पट्टा, 20 हजार से अधिक वन पट्‌टा अब भी लंबित

जंगल और जमीन पर आदिवासी एवं पारंपरिक वनवासी समुदायों के अधिकार को कानूनी मान्यता देने वाला वनाधिकार कानून-2006 लागू हुए करीब 18 साल हो चुके हैं, लेकिन झारखंड में आज भी बड़ी संख्या में परिवार अपने वनाधिकार के पट्टे का इंतजार कर रहे हैं। केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय की ओर से उपलब्ध कराए गए आंकड़ों के अनुसार, 30 जून 2026 तक झारखंड में कुल 1,10,756 वनाधिकार दावे दाखिल किए गए। इनमें 1,07,032 व्यक्तिगत और 3,724 सामुदायिक वनाधिकार के दावे शामिल हैं। इनमें से कुल 61,970 दावों को ही पट्टा मिल सका है। यानी कुल दावों में महज 55.95 प्रतिशत को कानूनी मान्यता मिली है।

दूसरी ओर 28,107 दावे खारिज किए जा चुके हैं, जबकि 20,679 दावे अब भी लंबित हैं। आंकड़े बताते हैं कि वनाधिकार कानून के बावजूद हजारों परिवारों के लिए जंगल पर उनके पारंपरिक अधिकार का सवाल अब तक पूरी तरह हल नहीं हो सका है। व्यक्तिगत वनाधिकार के 59,866 और सामुदायिक वनाधिकार के 2,104 पट्टे वितरित किए गए हैं। कुल पट्टों की संख्या के लिहाज से झारखंड देश में सातवें स्थान पर है, लेकिन राज्य में दाखिल दावों की बड़ी संख्या और लंबित मामलों को देखते हुए तस्वीर अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।

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छत्तीसगढ़ और ओडिशा से काफी पीछे झारखंड

वनाधिकार पट्टों के वितरण के मामले में झारखंड देश के सात प्रमुख राज्यों में शामिल है। हालांकि, पट्टों की संख्या में राज्य छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्य प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से काफी पीछे है। आंकड़ों के मुताबिक छत्तीसगढ़ में अब तक 5,34,068 वनाधिकार पट्टे वितरित किए जा चुके हैं। ओडिशा में 4,73,640, मध्य प्रदेश में 2,94,877, तेलंगाना में 2,31,456, आंध्र प्रदेश में 2,28,489 और महाराष्ट्र में 2,08,335 पट्टे दिए गए हैं। इसके मुकाबले झारखंड में पट्टों की संख्या 61,970 है। हालांकि, झारखंड में वितरित पट्टों के जरिए 2,57,154.83 एकड़ वनभूमि को कानूनी मान्यता मिली है।

इसमें व्यक्तिगत वनाधिकार के तहत 1,53,395.86 एकड़ और सामुदायिक वनाधिकार के तहत 1,03,758.97 एकड़ जमीन शामिल है। इसका मतलब है कि वनाधिकार कानून के तहत सिर्फ जमीन का व्यक्तिगत कब्जा ही नहीं, बल्कि सामुदायिक स्तर पर जंगल और वन संसाधनों पर अधिकार को भी मान्यता दी गई है। आदिवासी बहुल झारखंड में यह अधिकार ग्रामीण अर्थव्यवस्था और आजीविका से सीधे जुड़ा हुआ है, क्योंकि बड़ी संख्या में परिवार खेती, लघु वनोपज और अन्य वन संसाधनों पर निर्भर हैं।

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26 हजार से ज्यादा आवेदन खारिज

झारखंड में वनाधिकार के सबसे अधिक दावे व्यक्तिगत अधिकारों से जुड़े हैं। राज्य में 1,07,032 व्यक्तिगत वनाधिकार दावे दाखिल किए गए, लेकिन इनमें से 59,866 को ही पट्टा मिला। यानी करीब 56 प्रतिशत व्यक्तिगत दावों को मान्यता दी गई। वहीं 26,370 व्यक्तिगत दावे खारिज किए जा चुके हैं और 20,796 मामले अब भी लंबित हैं। सामुदायिक वनाधिकार के मामले में भी स्थिति बहुत बेहतर नहीं है। राज्य में 3,724 सामुदायिक दावे दाखिल हुए, जिनमें 2,104 को पट्टा मिला, जबकि 1,737 दावे खारिज किए गए और करीब 20 दावे लंबित बताए गए हैं।

सामुदायिक वनाधिकार का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि इसके तहत किसी एक परिवार को जमीन का अधिकार देने के बजाय पूरे ग्राम समुदाय को जंगल, लघु वनोपज और सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण, उपयोग और प्रबंधन से जुड़े अधिकार मिलते हैं। ऐसे में सामुदायिक दावों की कम संख्या और बड़ी संख्या में उनके खारिज होने का मुद्दा झारखंड जैसे वन और आदिवासी बहुल राज्य के लिए खासा महत्वपूर्ण है। आंकड़ों में व्यक्तिगत और सामुदायिक दावों के निपटारे के बीच भी बड़ी चुनौती दिखाई देती है, जिससे यह सवाल उठता है कि पात्र परिवारों और ग्राम समुदायों तक कानून का वास्तविक लाभ किस गति से पहुंच रहा है।

13 महीने से आंकड़ों में बदलाव नहीं

वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन को लेकर सबसे महत्वपूर्ण सवाल केंद्र सरकार के आंकड़ों में लंबे समय से बदलाव नहीं होने को लेकर है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 31 मई 2025 तक भी झारखंड में 1,10,756 वनाधिकार दावे और 61,970 पट्टे दर्ज थे। 30 जून 2026 तक भी यही संख्या दर्ज है। यानी करीब 13 महीने के दौरान केंद्र के उपलब्ध आंकड़ों में न तो नए दावों की संख्या बढ़ी और न ही वितरित पट्टों की संख्या में कोई बदलाव दर्ज हुआ। इससे दो संभावनाएं सामने आती हैं- या तो राज्य में नए दावों के निपटारे की प्रक्रिया बेहद धीमी हो गई है, या फिर राज्य स्तर से केंद्र सरकार को आंकड़ों का नियमित अपडेट नहीं भेजा गया।

खासकर सामुदायिक वनाधिकार के मामले में यह स्थिति अधिक चिंता पैदा करती है। वनाधिकार कानून का उद्देश्य सिर्फ जमीन पर कब्जे को नियमित करना नहीं, बल्कि वर्षों से जंगल पर निर्भर आदिवासी और पारंपरिक वनवासी समुदायों को उनके अधिकारों की कानूनी सुरक्षा देना है। ऐसे में 20 हजार से अधिक लंबित दावों और हजारों खारिज मामलों के बीच आंकड़ों का लंबे समय तक स्थिर रहना कानून के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करता है। झारखंड में अब चुनौती केवल नए पट्टे जारी करने की नहीं, बल्कि लंबित दावों के पारदर्शी निपटारे, खारिज दावों की समीक्षा और सामुदायिक वनाधिकार को प्रभावी तरीके से लागू करने की भी है।

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