भारत में किसानों को सब्सिडी दिए जाने का पुराना नियम है. किसानों को दी जा रही सब्सिडी और किसानों की मेहनत के दम पर ही आज भारत में कृषि उत्पादों का एक प्रमुख निर्यातक देश है जो आजादी के दो तीन दशक तक निर्यातक देश था. युरिया सब्सिडी भी एक ऐसी ही सब्सिडी की व्यवस्था है जो किसानों को दी जाती है. पर आज यह एक बड़ी समस्या बन चुका है क्योंकि वैश्विक परिस्थितियों के कारण आपूर्ति श्रृंखला में बाधा आई है और सरकार को यूरिया खरीदने के लिए दोगुना पैसा खर्च करना पड़ रहा है. वहीं देश के अंदर भी किसान परेशान हैं क्योंकि सप्लाई कम होने के कारण खाद की कालाबाजारी बढ़ी है और किसानों को सरकार द्वारा तय की गई कीमत से अधिक दाम देकर युरिया की खरीद करनी पड़ रही है. इसके कारण किसानों को युरिया सब्सिडी का सही लाभ नहीं मिल रहा है. यह संकट ऐसे समय में सामने आया है जब खरीफ सीजन चल रहा है और इस समय युरिया की खपत सबसे ज्यादा होती है.

यूरिया की कमी का मुख्य कारण
यूरिया की कीमतो दोगुनी होने का प्रमुख कारण पश्चिम एशिया में चल रहा मौजूदा तनाव है. होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव के कारण यूरिया और उसके उत्पादन के लिए जरूरी प्राकृतिक गैस का आयात काफी महंगा हो गया है. इस वजह से चालू वित्त वर्ष में सरकार का उर्वरक सब्सिडी बिल बजट में तय 1.71 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 3 लाख करोड़ रुपये ($31 बिलियन) के पार जाने का अनुमान है. इससे युरिया के कारण सरकार के खजाने में बोझ बढ़ना तय़ है. दूसरी तरफ देश में सरकार किसानों को सस्तें दरों पर यूरिया दे रही है. किसानों को यूरिया की 45 किलोग्राम की बोरी केवल 266.5 रुपये ($2.80) में मिलती है, जो सरकार द्वारा इसे आयात करने या बनाने की वास्तविक लागत के दसवें हिस्से से भी कम है. इस भारी छूट के कारण देश में यूरिया की खपत अमेरिका और ब्राजील की कुल खपत से भी ज्यादा हो चुकी है. इस भारी खर्च और विदेशी मुद्रा के बाहर जाने (outflow) की वजह से भारतीय रुपया इस साल एशिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल हो गया है.
घट रही है मिट्टी की क्षमता
सब्सिडी पर किसानों को यूरिया मिलने का जहां एक तरफ फायदा हुआ है. वहीं इसके नुकसान भी अब सामने आ रहे हैं. दशकों से यूरिया के अत्यधिक और असंतुलित उपयोग ने जमीन की उपजाऊ क्षमता को गंभीर नुकसान पहुँचाया है. मिट्टी की सेहत और पर्यावरण को नुकसान को नुकसान हुआ है. देश के कृषि मंत्रालय द्वारा जांचे गए 90 लाख से अधिक मिट्टी के नमूनों में से आधे से अधिक में ‘ऑर्गेनिक कार्बन’ (जैविक कार्बन) का स्तर काफी कम पाया गया है, जो मिट्टी की घटती उर्वरता का संकेत है. मृदा वैज्ञानिकों के अनुसार अगर मिट्टी में .5 प्रतिशत के कम कार्बन कंटेट पाया जाता है तो उसे बंजर माना जाता है. इसके अतिरिक्त, खेतों से बहने वाला रसायनों का पानी भूजल और नदियों को प्रदूषित कर रहा है, और हवा में नाइट्रस ऑक्साइड जैसी हानिकारक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ रहा है.

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युरिया की होगी राशनिंग
हालांकि इन सबके बीच मिट्टी की उर्रवरकता में सुधार के लिए कोशिशें भी जारी हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने देश के किसानों से यूरिया का उपयोग कम करने और जैविक विकल्पों को अपनाने की अपील की है. देश में जैविक खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है. सरकार वर्तमान में 40 जिलों में एक नई वितरण प्रणाली (distribution framework) का परीक्षण कर रही है, जहां किसानों की जमीन और बोई गई फसल के आधार पर उर्वरक की प्री-बुकिंग की जाएगी ताकि उन्हें जरूरत के हिसाब से ही यूरिया मिले. इसके साथ ही यूरिया की खरीद सीमा (जैसे प्रति खरीदार अधिकतम 50 बोरी प्रति महीना) भी तय की गई है.
बढ़ रही है महंगाई
हालांकि किसानों को यूरिया के संतुलित इस्तेमाल के बारे में जागरूक किया जा रहा है, लेकिन ऐसे देश में जहां पर अधिकांश किसान ग्रामीण परिवेश से आते हैं और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े हुए हैं, उन्हें विश्वास में लेना एक बड़ी चुनौती है. वे पुरानी आदतों और फसल की पैदावार घटने के डर से इस बदलाव को आसानी से अपनाने को तैयार नहीं हैं. पंजाब और हरियाणा के खेतों में काम करने वाले कई किसानों का मानना है कि यूरिया कम करने से उनकी तात्कालिक उपज पर बुरा असर पड़ सकता है. इस साल जहां अल नीनो के प्रभाव के कारण मॉनसून पर असर पड़ रहा है वहीं यूरिया की सीमित आपूर्ति से कृषि उत्पादन प्रभावित होने की संभावना है. विशेषज्ञों के अनुसार, इससे घरेलू स्तर पर खाद्य महंगाई (food inflation) बढ़ने का खतरा है, जिसका सीधा असर उन दर्जनों देशों पर भी पड़ सकता है जो भारतीय चावल और कृषि उत्पादों पर निर्भर हैं.