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झारखंड में बढ़ा मानव-हाथी संघर्ष, दो दशकों में 1300 से ज्यादा लोगों की मौत

हाथियों के हमले के मु्ख्य वजहों की बात करें तो सबसे पहला कारण जो सामने आता है वह है हाथी भ्रमण क्षेत्रों में अतिक्रमण. आकड़ों के अनुसार आज झारखंड के 480 गांव मानव-हाथी संघर्ष से सीधे तौर पर प्रभावित हैं. हाथियों के पारंपरिक रास्तों (कॉरिडोर) में इंसानी गतिविधियों के विस्तार, हाइवे और रेलवे नेटवर्क के निर्माण ने उनके रास्तों को बाधित कर दिया है. इसके कारण हाथियों को मजबूरन रिहायशी और कृषि क्षेत्रों से गुजरना पड़ता है. धरती पर इंसान और जंगली जानवरों के बीच का संघर्ष कोई नया नहीं है. इंसानी सभ्यता की शुरूआत से ही जंगली जीवों और इंसानों के बीच संघर्ष होते रहे हैं. लेकिन बीते कुछ दशकों से इसमें काफी बढ़ोतरी हुई है. झारखंड के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो यह आंकड़े डराने वाले हैं. क्योंकि हाल के वर्षों में झारखंड में हाथी और इंसानों के बीच होने वाले टकराव में तेजी आई है. राज्य में हाथियों और इंसानों के बीच का संघर्ष अब एक गंभीर मानवीय और पर्यावरणीय संकट बन चुका है. कभी जंगलों तक सीमित रहने वाले हाथी अब बस्तियों और खेतों की ओर रुख कर रहे हैं, जिससे बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान हो रहा है. वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (WII) के एक हालिया अध्ययन और वन विभाग के आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि विकास, औद्योगीकरण और सिकुड़ते जंगलों ने हाथियों को इंसानी बस्तियों की तरफ रुख करने पर मजबूर कर दिया है. भोजन की तलाश में हाथी जंगलों से बाहर निकल रहे हैं, और जो सामने आ रहा है उसे बर्बाद कर रहे हैं. हाथियों के लिए विचरण क्षेत्र निर्धारित किए गए हैं लेकिन उन क्षेत्रों में भी इंसानों ने अतिक्रमण कर दिया है. कहीं पर घर तो कही पर सड़कें बना दी गई है, जिससे हाथी रास्ता भटक जा रहे हैं और घटनाओं में तेजी आई है.

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हाथियों की हमलें की मुख्य वजह

हाथियों के हमले के मु्ख्य वजहों की बात करें तो सबसे पहला कारण जो सामने आता है वह है हाथी भ्रमण क्षेत्रों में अतिक्रमण. आकड़ों के अनुसार आज झारखंड के 480 गांव मानव-हाथी संघर्ष से सीधे तौर पर प्रभावित हैं. हाथियों के पारंपरिक रास्तों (कॉरिडोर) में इंसानी गतिविधियों के विस्तार, हाइवे और रेलवे नेटवर्क के निर्माण ने उनके रास्तों को बाधित कर दिया है. इसके कारण हाथियों को मजबूरन रिहायशी और कृषि क्षेत्रों से गुजरना पड़ता है. घटता वनक्षेत्र भी एक बड़ी समस्या है. झारखंड में बड़े पैमाने पर खुले खदानों (Open-cast mining) और अनियंत्रित औद्योगीकरण ने हाथियों के आवास क्षेत्र (Habitat) को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दिया है. झारखंड में वर्ष 2001 से 2020 के बीच लगभग 8000 हेक्टेयर वनक्षेत्र में कमी आई है. ओडिशा, छत्तीसगढ़ और बंगाल की सीमाओं पर जंगलों के कटने से विस्थापित हुए हाथी झारखंड की सीमा में प्रवेश कर रहे हैं. इसके अलावा बदलते बारिश के पैटर्न और भूजल स्तर में गिरावट के कारण जंगलों के प्राकृतिक जलस्रोत सूख रहे हैं, जिससे हाथी पानी की तलाश में गांव के तालाबों और नहरों की तरफ आ रहे हैं. जंगलों में पर्याप्त चारा न मिलने के कारण वे उच्च कैलोरी वाली कृषि फसलों और घरों में रखे अनाज और महुआ की ओर आकर्षित होते हैं. कई बार ग्रामीण जानकारी के अभाव में हाथियों के साथ सेल्फी लेने की कोशिश करते हैं या उन्हें भगाने के लिए तीर-धनुष या पत्थरों का इस्तेमाल करते हैं, जिससे हाथी हिंसक हो जाते हैं.

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झारखंड में हाथियों के हमले

झारखंड में पिछले एक दशक के दौरान हाथियों के हमले में काफी तेजी आई है. पिछले दो दशक के दौरान अब तक हाथियों के हमले में 1300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है. डब्लूआईआई (WII) की रिपोर्ट के अनुसार 2000 से 2023 के बीच कुल 1,340 मौतें और 400 घायल होने के मामले सामने आए. वहीं 2008 से 2024 के बीच 1251 लोगों की जान गई है और इसी अवधि में 202 हाथियों की भी मौत हुई है. 2019 से 2024 तक, इन पांच वर्षों में हाथियों के हमले में कुल 474 लोगों की जान गई. वर्ष 2021 में 133 मौतें दर्ज की गईं, जो पिछले कुछ वर्षों में सबसे अधिक थीं. वर्ष 2022 में 96 लोगों की मौत हुई. वर्ष 2023 में 87 मौतें दर्ज की गईं. वर्ष 2025 के शुरुआती महीनों में ही लगभग 16 मौतें दर्ज की गई थीं. वर्ष 2026 में अब तक जनवरी-फरवरी के महज दो से तीन हफ्तों के भीतर रामगढ़ और पश्चिमी सिंहभूम जैसे इलाकों में 22-23 लोगों की दर्दनाक मौत हुई. अधिकांश मामलों में देखा गया है कि हाथियों द्वारा हमले उन परिस्थितियों में किए गए जब उन्हें छेड़ा गया.

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हाथियों के संरक्षण के लिए उठाए जा रहे कदम

हाथियों के संरक्षण और बचाव के लिए कई प्रयास भी किए जा रहे हैं. हाथियों के झुंड का नेतृत्व करने वाली मादा हाथियों के गले में रेडियो कॉलर लगाने की अनुमति केंद्र सरकार से मांगी गई है ताकि उनकी सटीक लोकेशन ट्रेस की जा सके. ग्रामीणों को हाथियों की लोकेशन बताने के लिए ‘हमर हाथी’ (Hamar Haathi) ऐप और ड्रोन का इस्तेमाल किया जा रहा है. हमलों को रोकने के लिए त्वरित प्रतिक्रिया टीमें (QRT) बनाई जा रही हैं और जंगली हाथियों को नियंत्रित करने के लिए तमिलनाडु से 6 प्रशिक्षित ‘कुनकी’ हाथी मंगाए जा रहे हैं. राज्य में एलीफेंट रेस्क्यू सेंटर स्थापित करने की योजना है. राज्य में 17 से अधिक एलीफेंट कॉरिडोर अधिसूचित किए गए हैं. वर्तमान में हाथी के हमले से होने वाली मौत पर पीड़ित परिवार को 4 लाख रुपये तक का मुआवजा दिया जाता है. जिसे ओडिशा की तर्ज पर बढ़ाने पर सरकार विचार कर रही है. पहले यह राशि ढाई लाख रुपये तक थी. रेलवे लाइनों और राष्ट्रीय राजमार्गों पर सुरक्षित आवाजाही के लिए अंडरपास और ओवरपास का निर्माण अनिवार्य किया जाना चाहिए.

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