झारखंड में PESA की 2025 नियमावली ने अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा की भूमिका को महज पंचायत की एक बैठक से आगे ले जाकर स्थानीय फैसलों की महत्वपूर्ण संस्था के रूप में रखा है। PESA यानी Panchayats (Extension to Scheduled Areas) Act, 1996 का मूल उद्देश्य पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों में आदिवासी समुदायों की परंपराओं, सामुदायिक संसाधनों और स्थानीय शासन में ग्रामसभा की भूमिका को मजबूत करना है। देश के 10 राज्य इसके दायरे में आते हैं, लेकिन झारखंड की नियमावली में पारंपरिक ग्राम संस्थाओं, जमीन, खनन, लघु वनोपज और विकास परियोजनाओं को लेकर कई विस्तृत प्रावधान किए गए हैं।
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महीने में कम से कम एक बैठक, महिलाओं की भागीदारी भी जरूरी
झारखंड की व्यवस्था में ग्रामसभा को केवल मुखिया या वार्ड सदस्यों की बैठक के रूप में नहीं देखा गया है। मांझी, मुंडा, मानकी, पाहन, महतो और परगना जैसी पारंपरिक संस्थाओं से जुड़े लोगों को ग्रामसभा की अध्यक्षता में स्थान दिया गया है। ग्रामसभा की बैठक कम से कम महीने में एक बार होगी और कुल सदस्यों के एक-तिहाई का कोरम जरूरी होगा। खास बात यह है कि इस कोरम में कम से कम एक-तिहाई महिलाओं की उपस्थिति भी अनिवार्य रखी गई है। ग्राम पंचायत और उसकी समितियों को ग्रामसभा के नियंत्रण एवं दिशा-निर्देश में काम करने तथा उसके प्रति जवाबदेह रहने की व्यवस्था की गई है।
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जमीन और परियोजनाओं पर अब गांव की आवाज ज्यादा महत्वपूर्ण
PESA का सबसे बड़ा व्यावहारिक असर जमीन और विकास परियोजनाओं के मामलों में दिखाई दे सकता है। झारखंड की नियमावली में भूमि अधिग्रहण और पुनर्स्थापन के मामलों में ग्रामसभा की पूर्व-सहमति का प्रावधान रखा गया है। गांव में किसी योजना या परियोजना को शुरू करने से पहले भी संबंधित ग्रामसभा के सामने उसका तकनीकी और वित्तीय विवरण, फंड का स्रोत, ठेकेदार की भूमिका और स्थानीय श्रम के इस्तेमाल जैसी जानकारी रखनी होगी। ग्रामसभा प्रस्ताव को मंजूर करने के साथ उसमें शर्त या बदलाव का निर्देश भी दे सकती है। हालांकि परियोजनाओं को अनिश्चितकाल तक रोकने की व्यवस्था नहीं है। सामान्य तौर पर 30 दिनों में निर्णय देना होगा और विशेष परिस्थिति में 30 दिन की अतिरिक्त अवधि मिल सकती है।
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इसे एक उदाहरण से समझें। किसी अनुसूचित क्षेत्र के गांव में सड़क, ट्रांसमिशन लाइन, उद्योग या खनन परियोजना के लिए जमीन की जरूरत है। पहले सरकारी स्वीकृतियों और जमीन से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर ज्यादा जोर रहता था। PESA व्यवस्था में परियोजना का स्थानीय प्रभाव, जमीन, पुनर्वास और अन्य शर्तें ग्रामसभा के सामने रखना महत्वपूर्ण होगा। यानी गांव के लोगों की जानकारी और भागीदारी परियोजना प्रक्रिया का हिस्सा बनेगी।
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खनन कंपनियों के लिए चुनौती, गांव के लिए आर्थिक अवसर
खनिज संपदा वाले झारखंड में PESA का असर खनन क्षेत्र पर खासा महत्वपूर्ण हो सकता है। लघु खनिजों के खनन पट्टे या खुली खान के अनुमति-पत्र के लिए अनुसूचित क्षेत्र की ग्रामसभा की पूर्व संसूचित स्वतंत्र सहमति का प्रावधान नियमावली में रखा गया है। बालू घाटों के मामले में भी ग्रामसभा को भूमिका दी गई है और Category-1 बालू घाटों से मिलने वाले राजस्व को ग्रामसभा कोष के जरिए स्थानीय विकास में लगाने की व्यवस्था बताई गई है।
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दूसरी तरफ लघु वनोपज PESA को सीधे ग्रामीण अर्थव्यवस्था से जोड़ता है। महुआ, शहद, लाख, तसर, साल बीज और दूसरे वन उत्पादों के संग्रह, प्रबंधन और बिक्री में ग्रामसभा की भूमिका बढ़ने से स्थानीय लोगों को अपने संसाधनों पर अधिक नियंत्रण मिल सकता है। यदि गांव केवल कच्चा माल बेचने के बजाय प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन से जुड़े, तो इससे स्थानीय आय के नए रास्ते खुल सकते हैं।
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पंचायत, कंपनियों और सरकार के लिए असली परीक्षा अब शुरू
PESA को केवल कंपनियों के खिलाफ कानून मानना सही नहीं होगा। इसके कारण अनुसूचित क्षेत्रों में काम करने वाली कंपनियों और PSU (सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी) को परियोजना शुरू करने से पहले स्थानीय समुदाय के साथ अधिक संवाद करना होगा। जमीन, पुनर्वास, रोजगार, संसाधनों पर असर और परियोजना से मिलने वाले स्थानीय लाभ जैसे मुद्दों पर ग्रामसभा के सवालों का जवाब देना पड़ेगा। इससे परियोजनाओं की तैयारी में समय और अनुपालन लागत बढ़ सकती है, लेकिन दूसरी ओर शुरुआत से स्थानीय सहमति मिलने पर लंबे समय के सामाजिक विवाद और परियोजना संबंधी जोखिम कम भी हो सकते हैं।
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पंचायत दर्पण की टीम यह मानती है कि PESA की असली परीक्षा कानून की किताब में नहीं, ग्रामसभा के मैदान में होगी। अधिकार मिलने के बाद ग्रामसभा के पास परियोजना की तकनीकी जानकारी समझने, सरकारी रिकॉर्ड देखने, वित्तीय गणना करने और अपने फैसले दर्ज करने की क्षमता भी होनी चाहिए। इसके लिए कानूनी और वित्तीय साक्षरता, तकनीकी सहायता तथा ग्रामसभा के सदस्यों का प्रशिक्षण उतना ही जरूरी है जितना अधिकारों का प्रावधान। साथ ही निर्वाचित पंचायत और पारंपरिक ग्राम संस्थाओं के बीच अधिकारों का संतुलन भी महत्वपूर्ण रहेगा।
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आखिर में सवाल यह नहीं है कि PESA सरकार के हाथ में रहेगा या ग्रामसभा के। असली सवाल यह है कि दोनों मिलकर गांव के विकास का फैसला कैसे करेंगे। अगर ग्रामसभा को विकास रोकने वाली संस्था के बजाय निर्णय प्रक्रिया का साझेदार बनाया गया, तो खनन, उद्योग और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं में स्थानीय विश्वास बढ़ सकता है। वहीं यदि ग्रामसभा की शक्तियां केवल कागज पर रहीं, तो PESA भी उन कई कानूनों की तरह रह जाएगा जिनके अधिकार गांव तक पहुंचते-पहुंचते कमजोर पड़ जाते हैं। झारखंड की नई व्यवस्था की सबसे बड़ी ताकत यही है कि उसने गांव की आवाज को औपचारिकता से निकालकर निर्णय प्रक्रिया के करीब लाने की कोशिश की है, और इसकी सबसे बड़ी चुनौती भी यही है।
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