कम बारिश और अलनीनो के असर ने फसलों के उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसका असर अब सिर्फ खेतों तक सीमित रहने के बजाय खाद्य कीमतों पर भी दिखाई देने लगा है। गन्ने और मक्के के उत्पादन में संभावित कमी से चीनी और एथेनॉल की लागत बढ़ने की आशंका है। वहीं मक्का महंगा होने का सीधा असर पोल्ट्री चारे पर पड़ सकता है, जिससे आने वाले समय में अंडे और चिकन की कीमतों पर भी दबाव बन सकता है।
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चीनी की कीमत बढ़ी, गन्ने की फसल पर नजर
पिछले साल गन्ने की फसल को ज्यादा बारिश और रेड-रॉट फंगस से नुकसान पहुंचा था। इसके बावजूद उत्पादन को लेकर शुरुआती अनुमान अपेक्षाकृत बेहतर रहे। रिपोर्ट के मुताबिक, त्योहारों का मौसम शुरू होने से पहले चीनी की कीमत जुलाई के अंत में करीब ₹49 प्रति किलो से बढ़कर अगस्त के अंत में करीब ₹65 प्रति किलो हो गई। 13 सितंबर 2026 तक सालाना आधार पर चीनी की कीमत में करीब 27 प्रतिशत बढ़ोतरी दर्ज की गई। इस बीच एथेनॉल मिश्रण और चीनी निर्यात ने भी घरेलू बाजार की उपलब्धता पर असर डाला।
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एथेनॉल की मांग ने मक्का पर बढ़ाया दबाव
गन्ने से देश की कुल एथेनॉल आपूर्ति का करीब 25 प्रतिशत हिस्सा आता है, जबकि बाकी एथेनॉल मुख्य रूप से अनाज, खासकर मक्का से तैयार होता है। 1 अप्रैल से ई-20 पेट्रोल को पूरे देश में मानक बनाए जाने के बाद एथेनॉल की जरूरत और महत्वपूर्ण हो गई है। 2025-26 में चीनी उत्पादन घटने के बावजूद 30 लाख टन से ज्यादा गन्ने का इस्तेमाल एथेनॉल के लिए किया गया और करीब आठ लाख टन चीनी का निर्यात हुआ। यदि अगले सीजन में गन्ने की उपलब्धता कम होती है और गन्ने से एथेनॉल उत्पादन घटाया जाता है, तो इसकी भरपाई के लिए मक्का की मांग बढ़ सकती है।
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मक्का महंगा हुआ तो पोल्ट्री चारे की लागत बढ़ेगी
मक्का पोल्ट्री उद्योग के लिए चारे में ऊर्जा का प्रमुख स्रोत है। 2025 में देश का पोल्ट्री उद्योग करीब ₹2.6 लाख करोड़ का था। रिपोर्ट के अनुसार, 13 सितंबर तक मक्के की कीमत सालाना आधार पर करीब 30 प्रतिशत बढ़ चुकी थी, जबकि अप्रैल-सितंबर 2026 के दौरान पोल्ट्री चारे की कीमत में करीब 25 प्रतिशत वृद्धि दर्ज हुई। सोयाबीन खली की बढ़ती कीमत भी चारे की लागत बढ़ा रही है। ऐसे में यदि कम बारिश के कारण मक्के का उत्पादन प्रभावित होता है, तो पोल्ट्री किसानों की लागत और बढ़ सकती है।
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गन्ने से अंडे-चिकन तक जुड़ी है कीमतों की कड़ी
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए एक सामान्य उदाहरण पर्याप्त है। यदि गन्ने की पैदावार कम होती है तो चीनी उत्पादन पर दबाव आएगा और एथेनॉल के लिए वैकल्पिक कच्चे माल की जरूरत बढ़ेगी। मक्का इस मांग का बड़ा हिस्सा पूरा करता है। मक्का महंगा होने पर पोल्ट्री चारा महंगा होगा और चारे की लागत बढ़ने से मुर्गी पालन की लागत भी बढ़ सकती है। अंततः इसका असर अंडे और चिकन की खुदरा कीमतों पर पड़ने की संभावना है। यानी गन्ना → एथेनॉल → मक्का → पोल्ट्री चारा → चिकन और अंडे की यह कड़ी मौसम, उत्पादन और बाजार के बीच बढ़ते संबंध को दिखाती है।
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