बिहार में अगले साल होने वाले पंचायत चुनाव की तैयारी के बीच नए परिसीमन और आरक्षण रोस्टर को लेकर गांवों की राजनीति में हलचल बढ़ गई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, करीब 10 साल बाद नया आरक्षण रोस्टर लागू किया जा सकता है। इसका सीधा असर मुखिया, सरपंच और वार्ड सदस्य की सीटों पर पड़ सकता है। मौजूदा करीब 8 हजार मुखिया सीटों की संख्या भी बढ़ने की संभावना जताई जा रही है, हालांकि अंतिम तस्वीर आधिकारिक परिसीमन और अधिसूचना के बाद ही साफ होगी।
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जाति सर्वे के आंकड़ों से तैयार होगा नया परिसीमन
रिपोर्ट्स के मुताबिक राज्य निर्वाचन आयोग ने 2022-23 के जाति आधारित सर्वे के आंकड़े मांगे हैं और इन्हीं आंकड़ों को नए परिसीमन की प्रक्रिया में इस्तेमाल किए जाने की बात कही जा रही है। पंचायतों की सीमाओं, वार्ड और मतदाता सूचियों में भी बदलाव संभव है। करीब 7 हजार की आबादी के आसपास एक पंचायत बनाने का फॉर्मूला अपनाए जाने की चर्चा है, लेकिन यह भी अभी अंतिम निर्णय नहीं है। आबादी और मतदाताओं की संख्या में बदलाव के आधार पर कुछ पंचायतों का पुनर्गठन किया जा सकता है।
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आरक्षण बदला तो कई पुराने गढ़ खुल जाएंगे
नए रोस्टर का सबसे बड़ा असर उन पंचायतों में दिख सकता है, जहां लगातार दो चुनावों से किसी एक वर्ग का दबदबा रहा है। मसलन, अगर किसी पंचायत में एससी, एसटी या ओबीसी आबादी का अनुपात नए आंकड़ों के आधार पर आरक्षण की सीमा को प्रभावित करता है, तो वहां सीट का वर्ग बदल सकता है। लंबे समय से आरक्षित रही कोई सीट सामान्य या महिला वर्ग के लिए खुल सकती है, वहीं सामान्य सीट एससी, एसटी या ओबीसी के लिए आरक्षित हो सकती है। इसका मतलब यह होगा कि कई पुराने दावेदारों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी और नए चेहरों के लिए चुनाव लड़ने का रास्ता खुल सकता है।
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बढ़ी सीटों का मतलब नए राजनीतिक मौके
परिसीमन का असर केवल आरक्षण तक सीमित नहीं रहेगा। पंचायतों की सीमा बदलने के साथ मुखिया, सरपंच और वार्ड सदस्य की सीटों की संख्या में भी बदलाव हो सकता है। यदि नई पंचायतें बनती हैं तो नए पद और नए चुनावी क्षेत्र सामने आएंगे। उदाहरण के तौर पर जिस इलाके में अभी एक मुखिया के अधीन कई गांव आते हैं, परिसीमन के बाद आबादी के आधार पर उसका विभाजन होने पर अलग पंचायत और अलग मुखिया पद बन सकता है। इससे स्थानीय राजनीति में नए नेतृत्व को जगह मिलने की संभावना बढ़ेगी।
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अंतिम तस्वीर अधिसूचना के बाद ही साफ होगी
फिलहाल करीब 8 हजार से अधिक मुखिया सीटें होने की संभावना जैसी बातें सामने आ रही हैं, लेकिन इसे अंतिम आंकड़ा मानना जल्दबाजी होगी। परिसीमन की प्रक्रिया पूरी होने, पंचायतों की सीमाएं तय होने और आरक्षण रोस्टर जारी होने के बाद ही सीटों की वास्तविक संख्या स्पष्ट होगी। इतना तय है कि अगर नया रोस्टर लागू हुआ तो बिहार के गांवों में चुनावी समीकरण बड़े पैमाने पर बदल सकते हैं। कई पंचायतों में पुराने राजनीतिक समीकरण टूटेंगे और आरक्षण की नई तस्वीर के साथ नए दावेदार चुनावी मैदान में उतरेंगे।
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