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Panchayat Darpan

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जब भाईयों ने खाया था अपने बहन का मांस…रांची के बिंदो टोंगरी की कहानी, एक रोंगटे खड़े कर देनेवाली लोककथा

झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 30 किलोमीटर दूर बुढ़मू प्रखंड के गिंजो ठाकुरगांव में स्थित ‘बिंदो टोंगरी’ (बिन्धु टोंगरी) एक ऐसा ऐतिहासिक एवं पौराणिक स्थल है, जो अपनी रोंगटे खड़े कर देने वाली लोककथा के लिए पूरे क्षेत्र में प्रसिद्ध है । यहां पर स्थित बांस के झुरमुठ में एक इतिहास छुपा हुआ है, इतिहास भाई बहनों के अनोखे प्रेम और लालच का है। सात भाइयों और उनकी इकलौती बहन से जुड़ी यह सदियों पुरानी लोककथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक परंपरा के माध्यम से आज भी झारखंड के घर-घर में सुनाई जाती है ।

साग में खून और भाइयों का लालच

लोककथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक परिवार में सात भाई और उनकी इकलौती छोटी बहन खुशी-खुशी निवास करते थे । इकलौती बहन अत्यंत शांत स्वभाव, संस्कारी व आज्ञाकारी थी, जबकि सबसे छोटा भाई अपनी बहन से गहरा स्नेह रखता था। एक दिन जब सभी बड़े भाई और भाभियां खेतों में काम करने गए, तब बहन अकेले घर पर ‘सरौटी’ (छाता) साग की सब्जी बनाने लगी । हंसुआ या बैठी से साग काटते समय अचानक उसकी उंगली कट गई और बहता हुआ खून साग में मिल गया । शाम को काम से लौटने पर जब भाइयों ने भोजन किया, तो उन्हें साग का स्वाद अत्यंत अद्भुत व स्वादिष्ट लगा । भाइयों के बार-बार पूछने पर बहन ने डरते-डरते उंगली कटने का सच बता दिया। यह सच जानते ही लालची भाइयों के मन में पाप आ गया। उन्होंने आपस में विचार किया कि यदि बहन के खून की एक बूंद इतनी स्वादिष्ट है, तो उसका मांस कितना स्वादिष्ट होगा ।

मचान पर तीर और ‘बिंधू-बिंधू दादा’ की करुण पुकार

भाइयों ने बहन को मारने की योजना बनाई और शिकार के बहाने उसे जंगल में ले जाकर केंद के पेड़ पर बने मचान पर बैठा दिया । पास की एक पहाड़ी (टोंगरी) की चट्टान पर जाकर भाइयों ने अपने तीरों की धार तेज की और बहन पर निशाना साधा। भाइयों की मंशा समझकर बहन अपनी मातृभाषा में करुण स्वर में गाने लगी: “बिंधू-बिंधू दादा, छाती ताईक-ताईक” (अर्थात—हे दादा, मारना ही है तो तीर सीधे मेरी छाती पर चलाओ)। छह बड़े भाइयों का निशाना चूक गया, लेकिन अंत में अन्य भाइयों के भारी दबाव में आकर सबसे छोटे भाई द्वारा चलाया गया तीर सीधा बहन के सीने में जा लगा ।

छोटे भाई का स्नेह और ‘बांस बुदा’ का रहस्य

छह भाइयों ने बहन का मांस पकाया और खाया, परंतु छोटा भाई अपनी बहन से अत्यधिक प्रेम करने के कारण उसका मांस नहीं खा सका । उसने चुपके से मांस को दीमक के एक टीले (टील्हा) में छिपा दिया और खुद मछली व केकड़ा खाया । कालांतर में उस टीले से एक सुंदर ‘बांस बुदा’ (बांस का झुंड) उगा । उस बांस से बने वाद्ययंत्र (केंदरा/बांसुरी) से अद्भुत सुरीली ध्वनि निकलती थी । आगे चलकर छोटे भाई ने उस केंदरा को खरीदा, जिससे उसकी बहन पुनर्जीवित होकर इंसानी रूप में बाहर आई और दोनों भाई-बहन पुनः सुख-पूर्वक साथ रहने लगे ।

वर्तमान में जीवित अवशेष और लोक आस्था

आज भी बिंदो टोंगरी में इस पौराणिक घटना से जुड़े साक्ष्य प्रत्यक्ष रूप से मौजूद हैं । पहाड़ी की चट्टान पर तीरों को धार देने के घिसे हुए निशान, ‘बांस बुदा’ और जल हेतु प्रयुक्त पौराणिक ‘डाड़ी’ (छोटा कुआं) वर्तमान में भी स्थित हैं। स्थानीय ग्रामीण एवं श्रद्धालु यहाँ आषाढ़ी पूजा व नवरात्रि के अवसर पर विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और हर वर्ष भव्य मेले का आयोजन होता है ।

मेला को लेकर हुई बैठक

इस साल भी यहां पर मेला लगाने को लेकर तैयारी की जा रही है। मेला धूमृधाम से आयोजित किया जाए और यहां की मशहूर लोक कथा हर व्यक्ति तक पहुंचे इसके लिए स्थानीय लोग पहले से ही मेले की तैयारी में जुट जाते हैं। मेले की तैयारी को लेकर मंगलवार को यहां ग्रामीणों ने एक बैठक आयोजित की और मेले के सफल आयोजन को लेकर चर्चा की ।